अरैल से लेकर सलोरी, फाफामऊ तक फैले कुंभ क्षेत्र में निवास कर रहे लाखों संत और श्रद्धालुओं का नाता जिससे जुड़ा है, वह है यहां की रेती।
शास्त्रों में संगम क्षेत्र की रेती का विशेष महत्व है। इसे भगवान की चरण रेणु यानी चरण रज कहा गया है। कुंभ में आए संत और श्रद्धालु इस रेती को रोज अपने माथे पर लगाना नहीं भूलते। इसी रेती में लेटना, भोजन करना और उसी पर बैठकर भजन-पूजन करना पूरे कुंभ तक चलेगा।
देवरहा बाबा सेवाश्रम पीठ के प्रमुख डा. रामेश्वर प्रपन्नाचार्य का कहना है कि, संगम की रेत इसलिए पवित्र है क्योंकि सनातन काल से इस रेती पर संतों के चरण पड़ते रहे हैं। जिसकी वजह से यह पवित्र हो गई है। अनादिकाल में भगवान राम, कृष्ण के चरण भी इसी रेती पर पड़े हैं। यही वजह है कि जब इस रेती को भक्त अपने माथे पर धारण करते हैं, उसे अपने शरीर में लपेटते हैं तो इसके पीछे आस्था के साथ इसका वैज्ञानिक महत्व भी होता है।
जब हम किसी विशिष्ट व्यक्ति, संत महात्मा के पांव छूते हैं तो उससे ऊर्जा मिलती है। इसी तरह देवताओं और संतों के चरण से पवित्र हो चुकी रेत से भी शरीर, मन, आत्मा को असीम ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
प्रपन्नाचार्य ने बताया कि संगम के बीच से रेत का कुछ अंश का पान भी किया जाता है। मान्यता है कि इससे शरीर के अंदर के सभी विकार दूर हो जाते हैं, साथ ही अध्यामिकता का बोध भी होता है।