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Allahabad High Court : कोर्ट आदेश फाइनल होने के बाद मूल नियुक्ति पर सवाल उठाना गलत

Sat, 17 Dec 2022 09:50 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 17 Dec 2022 09:50 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अंशकालिक अध्यापक को बकाया वेतन देने के आदेश पर, मूल नियुक्ति ही अवैध कह कर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते। दस वर्ष पहले वेतन भुगतान आदेश को चुनौती नहीं दी गई, वह फाइनल हो गया।

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It is wrong to question the original appointment after the court order is final.
(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अंशकालिक अध्यापक को बकाया वेतन देने के आदेश पर, मूल नियुक्ति ही अवैध कह कर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते। दस वर्ष पहले वेतन भुगतान आदेश को चुनौती नहीं दी गई, वह फाइनल हो गया। कोर्ट ने जिला विद्यालय निरीक्षक चंदौली के 5 फरवरी 20 के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि वह याची की अमर वीर सिंह इंटर कॉलेज धानापुर, चंदौली में अंशकालिक अध्यापन की उपस्थिति का निरीक्षण कर तीन माह में याची के बकाया वेतन का भुगतान करें। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह ने कपिल देव यादव की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

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मामले में एक अध्यापक की प्रोन्नति से पद खाली हुआ, जिसे निरीक्षक ने नियुक्ति के लिए भेजा। प्रबंध समिति ने ज्वाइन नहीं कराया। बाद में अंशकालिक अध्यापक के रूप में याची की 6 जून 1998 में नियुक्ति की गई। उसने 2मई 2012तक कार्य किया गया। उसे वेतन का भुगतान नहीं किया गया तो उसने हाईकोर्ट की शरण ली। कोर्ट ने निरीक्षक को प्रत्यावेदन तय करने का निर्देश दिया।

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It is wrong to question the original appointment after the court order is final.
(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

कहा, खाली पद भरने में याची को भी शामिल किया जाय। निरीक्षक ने याची का दावा खारिज कर दिया, जिसे दोबारा चुनौती दी गई। निरीक्षक का आदेश रद्द कर  कोर्ट ने  याची को 1998 से 2012 तक कार्य के वेतन का भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके बाद निरीक्षक ने यह कहते हुए वेतन भुगतान से इन्कार कर दिया कि याची की मूल नियुक्ति ही अवैध थी। 


प्रबंध समिति ने नियमों का पालन नहीं किया था। जिसे भेजा गया, उसे ज्वाइन नहीं कराया और शॉर्ट टर्म रिक्ति पर याची की नियुक्ति कर ली। कोर्ट ने कहा, इस मुद्दे पर कोर्ट में आपत्ति की गई थी। दस वर्ष पहले कोर्ट ने निरीक्षक को याची के वेतन का भुगतान करने का आदेश दिया है, जिसे चुनौती नहीं दी गई। अब उसी आधार पर निरीक्षक को वेतन देने से इन्कार करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि इस आदेश से बकाया वेतन के अलावा याची को अन्य कोई अधिकार नहीं मिलेगा।

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