हाईकोर्ट : पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाना चाहिए
याचियों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित आईपीसी की विभिन्न धाराओं में 22 दिसंबर 2022 को प्रयागराज के मेजा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। याचियों ने प्राथमिकी को चुनौती देते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगाने और प्राथमिकी रद्द करने की मांग की और कहा कि मामले में पक्षकारों के बीच 25 अप्रैल को ही समझौता हो गया है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब पक्षकारों के बीच समझौता हो गया तो जांच अधिकारी को उसी के आधार पर जांच प्रक्रिया पर आगे बढ़ना चाहिए। कोर्ट ने समझौते के आधार पर जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का आदेश दिया। यह भी कहा कि मौजूदा मामले को विचाराधीन रखने की जरूरत नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने शिवजी गुप्ता व छह अन्य की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है।
याचियों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित आईपीसी की विभिन्न धाराओं में 22 दिसंबर 2022 को प्रयागराज के मेजा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। याचियों ने प्राथमिकी को चुनौती देते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगाने और प्राथमिकी रद्द करने की मांग की और कहा कि मामले में पक्षकारों के बीच 25 अप्रैल को ही समझौता हो गया है।
याचियों के अधिवक्ता की ओर से कहा गया कि 25 अप्रैल को होने वाला समझौते के तहत पक्षकारों के बीच अब कोई विवाद नहीं रह गया है। प्राथमिकी रद्द होती है तो शिकायतकर्ता को भी कोई दिक्कत नहीं होगी। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी की ओर से संक्षिप्त जवाबी हलफनामा भी दाखिल किया गया है। कोर्ट ने कहा कि अगर पक्षकारों के बीच विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल किया गया है तो कार्रवाई को लंबित रखने का कोई उद्देश्य नहीं रह जाता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ज्ञान सिंह बनाम पंजाब सहित कई अन्य मामलों का हवाला दिया। कहा कि शीर्ष न्यायालय ने इन आदेशों में स्पष्ट किया है कि अगर विवाद गंभीर प्रकृति के नहीं है और उसमें सजा की संभावना कम हो तो समय को निरर्थक कार्यवाही में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।
अगर, अपराध गंभीर प्रकृति का है। जैस-हत्या, लूट, डकैती, दुष्कर्म आदि मामलों में पक्षकारों के बीच भले ही समझौता हुआ हो उसमें राहत नहीं दी जा सकती है। लेकिन अगर मामला वाणिज्यिक, वित्तीय, व्यापारिक या इस तरह के लेनदेन से उत्पन्न अपराध या दहेज से संबंधित, विवाह से उत्पन्न होने वाले अपराध, पारिवारिक विवाद जहां गलती मूल रूप से निजी या व्यक्तिगत प्रकृति की है और पक्षकारों ने अपने पूरे विवाद को सुलझा लिया है तो उसमें दोष सिद्ध किए जाने की संभावना बहुत कम है।