High Court : कल्याणकारी योजनाओं के मुआवजे को बीमा कंपनी याचिका में चुनौती नहीं दे सकती
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी प्रदेश सरकार के साथ हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के कथित उल्लंघन के आधार पर कल्याणकारी योजनाओं के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवजे को याचिका में चुनौती नहीं दे सकती।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी प्रदेश सरकार के साथ हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के कथित उल्लंघन के आधार पर कल्याणकारी योजनाओं के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवजे को याचिका में चुनौती नहीं दे सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा विवाद मूलरूप से अनुबंध से संबंधित है। इसे सिविल, कॉमर्शियल या आर्बिट्रेशन जैसे उचित मंच के सामने उठाया जाना चाहिए। यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने बीमा कंपनी की याचिका पर दिया है।
कानपुर नगर निवासी रचना सिंह के पति की 29 नवंबर 2018 को सड़क हादसे में मौत हो गई थी। रचना ने मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के तहत मुआवजे का दावा किया था। बीमा कंपनी ने दावा समय-सीमा से बाहर होने के आधार पर खारिज कर दिया। डीएम ने मामले पर दोबारा विचार कर 29 नवंबर 2025 को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया तो बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कंपनी की ओर से कहा गया कि दावा समय-सीमा से बाहर है। ऐसे में डीएम मुआवजा भुगतान का आदेश नहीं दे सकते। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि योजना का लाभार्थी न तो एमओयू का हिस्सा होते हैं और न ही बीमा कंपनी व राज्य सरकार के बीच अनुबंध के पक्षकार होते हैं। इसलिए उन्हें दोनों पक्षों के बीच संविदात्मक विवादों के कारण कानूनी लड़ाई में नहीं घसीटा जा सकता।
कोर्ट ने याचिका खारिज कर बीमा कंपनी को तीन महीने के भीतर पांच लाख रुपये का मुआवजा जारी करने का आदेश दिया है। साथ ही कंपनी को राज्य सरकार के खिलाफ अपने अनुबंध संबंधी विवाद को उचित मंच पर उठाने की स्वतंत्रता दी। कहा, मुआवजे में अनावश्यक देरी योजना के कल्याणकारी उद्देश्य के विपरीत है।