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High Court : तकनीकी आधार पर वैध चयन को अमान्य घोषित करना मनमाना, बीएसए 30 दिन में लें फैसला

Sun, 05 Apr 2026 02:43 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 05 Apr 2026 02:43 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल नहीं है तो विभागीय अधिकारियों की ओर से किसी प्रक्रियात्मक चूक या देरी के लिए पात्र उम्मीदवार को दंडित नहीं किया जा सकता। अति-तकनीकी आधारों पर किसी वैध चयन को अमान्य घोषित करना मनमाना और कानून के विपरीत है।

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High Court: Declaring a valid selection on technical grounds as invalid is arbitrary
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल नहीं है तो विभागीय अधिकारियों की ओर से किसी प्रक्रियात्मक चूक या देरी के लिए पात्र उम्मीदवार को दंडित नहीं किया जा सकता। अति-तकनीकी आधारों पर किसी वैध चयन को अमान्य घोषित करना मनमाना और कानून के विपरीत है।

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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने गोरखपुर के सेंट जॉन्स गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल की प्रबंधन समिति की याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही गोरखपुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) के 28 सितंबर 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें लिपिक विकास अलेक्जेंडर की नियुक्ति को अमान्य घोषित कर दिया गया था।
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कोर्ट ने आदेश में भी स्पष्ट किया कि 1984 के सेवा नियमों के तहत यदि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी चयन प्रक्रिया के दस्तावेज प्राप्त होने के 30 दिन के भीतर अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति की सूचना नहीं देते हैं तो संबंधित नियुक्ति को स्वतः स्वीकृत माना जाएगा। यदि अधिकारी इस अवधि के बाद कोई आदेश जारी करते हैं तो वह कानून की दृष्टि में शून्य होगा।
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मामला गोरखपुर के सेंट जॉन्स गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल में लिपिक भर्ती से जुड़ा है।

प्रबंधन ने 26 जुलाई 2016 को विज्ञापन निकालकर चयन प्रक्रिया शुरू की थी। 25 मई 2017 को चयन समिति ने विकास अलेक्जेंडर का चयन किया। गोरखपुर में उस समय आई भीषण बाढ़ के कारण चयन से संबंधित दस्तावेज विभाग को भेजने में देरी हुई। फाइल चार सितंबर 2017 को बीएसए कार्यालय पहुंचा। नियमानुसार बीएसए को चार अक्तूबर तक फैसला लेना चाहिए था पर प्रबंधन को बीएसए का आदेश सात अक्तूबर को मिला।

हालांकि, विभाग ने दावा किया कि आदेश 28 सितंबर को ही पारित कर दिया गया था। इस आदेश के जरिये लिपिक की भर्ती को इस आधार पर अमान्य घोषित किया कि चयन समिति में उनका कोई आधिकारिक प्रतिनिधि शामिल नहीं था। विज्ञापन व्यापक रूप से प्रसारित अखबारों में प्रकाशित नहीं था।

कोर्ट ने विभाग के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। माना कि विभाग ने जानबूझकर समय सीमा के बाद पिछली तारीख का आदेश दिखाने की कोशिश की, जो स्वीकार्य नहीं है। लिहाजा, कोर्ट ने लिपिक की नियुक्ति को वैध मानते हुए उसे सभी परिणामी लाभों सहित बहाल करने का आदेश दिया है।

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