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'क्या मेरे रिटायरमेंट का इंतजार है?': अरावली मामले पर सीजेआई सख्त, विशेषज्ञ समिति को नहीं दी 6 महीने की मोहलत

Mon, 07 Sep 2026 06:40 PM IST
देवेश त्रिपाठी आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Mon, 07 Sep 2026 06:40 PM IST
सार

अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा व संरक्षण पर काम कर रही उच्चाधिकार प्राप्त समिति को सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम रिपोर्ट जमा करने के लिए 30 नवंबर तक का समय दिया है। समिति ने 28 फरवरी 2027 तक छह महीने का अतिरिक्त समय मांगा था, जिसे अदालत ने स्वीकार नहीं किया।

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CJI surya kant stern on Aravalli asks Are you waiting for my retirement denies extension to expert committee
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और संरक्षण पर काम कर रही उच्चाधिकार प्राप्त समिति की छह महीने का अतिरिक्त समय देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सख्त रुख अपनाया। अदालत ने समिति को अंतिम रिपोर्ट 30 नवंबर तक जमा करने का निर्देश दिया।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने साफ किया कि समिति को अब और समय नहीं दिया जाएगा। समिति की पिछली समयसीमा 31 अगस्त को खत्म हो चुकी थी। समिति ने 28 फरवरी 2027 तक समय मांगा था। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, "समिति ने मूल रूप से मेरी सेवानिवृत्ति तक मामले को स्थगित करने की मांग की है।"
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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिए दिन-रात काम करने के निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर समिति तय समय में अपना काम पूरा नहीं कर पाती है तो वह समिति के पुनर्गठन पर विचार कर सकता है। पीठ ने समिति को 30 नवंबर तक काम पूरा करने का निर्देश देते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर उसे "दिन-रात काम" करना चाहिए।
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अदालत ने यह भी कहा कि अंतिम निष्कर्ष तय करने से पहले समिति को प्रभावी सलाह-मशविरा करना होगा। उसे राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों समेत सभी संबंधित पक्षों की बात सुनने का निर्देश दिया गया है।

अंतरिम रिपोर्ट पेश करने पर सुप्रीम कोर्ट ने की क्या टिप्पणी?
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को जरूरत पड़ने पर मुद्दे से जुड़े अंतरिम रिपोर्ट भी उसके सामने रखने की अनुमति दी है। इससे अरावली से जुड़े जरूरी मामलों पर पूरी प्रक्रिया खत्म होने का इंतजार किए बिना अदालत विचार कर सकेगी।

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ को बताया कि एक अंतरिम रिपोर्ट तैयार की जा चुकी है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "समिति को केवल अंतरिम रिपोर्ट नहीं, बल्कि अंतिम रिपोर्ट के साथ आना चाहिए।"

सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई विस्तार देने की मांग
भाटी ने कहा कि सभी संबंधित पक्षों को प्रभावी तरीके से सुनने और जरूरी सामग्री अदालत के सामने रखने के लिए समिति को अतिरिक्त समय की जरूरत है। केंद्र की सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि प्रभावित पक्षों को अपनी बात रखने का अभी सीमित अवसर मिला है। समिति की सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले उचित सुनवाई जरूरी होगी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 28 फरवरी 2027 तक छह महीने के विस्तार की मांग ठुकरा दी और अंतिम रिपोर्ट के लिए केवल 30 नवंबर तक का समय दिया। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी। यह मामला अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट की स्वत: संज्ञान कार्यवाही से संबंधित है।

जून में गठित समिति को कब तक देनी थी रिपोर्ट?
जून में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के महानिदेशक की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की थी। समिति को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और सीमांकन से जुड़े मुद्दों का व्यापक वैज्ञानिक आकलन करना था।

समिति को अरावली क्षेत्र की पहचान के लिए अपनाए गए मानकों के पर्यावरणीय, भूवैज्ञानिक और पारिस्थितिक प्रभावों की जांच कर 31 अगस्त तक रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने समिति को व्यापक स्तर पर सलाह-मशविरा करने और सभी संबंधित पक्षों से सुझाव लेने का निर्देश दिया था। इनमें सरकारें, पर्यावरणविद, संरक्षण विशेषज्ञ, गैर-लाभकारी संगठन, खनन पट्टाधारक, परियोजना से जुड़े पक्ष, किसान, खदान मजदूर और स्थानीय समुदाय शामिल हैं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि जिन मुद्दों पर विचार करना है, उनकी सूची अंतिम नहीं है। समिति अरावली पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण से जुड़े किसी अन्य जरूरी पहलू की भी जांच कर सकती है। विशेषज्ञ समिति का गठन सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल दिसंबर के उस फैसले के बाद हुआ था, जिसमें अरावली पहाड़ियों की संशोधित परिभाषा तय करने वाले उसके पहले के निर्देशों को फिलहाल रोक दिया गया था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने तब चिंता जताई थी कि संशोधित परिभाषा के तहत केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को अरावली पहाड़ियों के रूप में वर्गीकृत किया गया था। इससे पर्यावरण की दृष्टि से जुड़े बड़े क्षेत्रों के संरक्षण के दायरे से बाहर होने की आशंका थी।


इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसले पर रोक आगे बढ़ाते हुए यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था। साथ ही अरावली पर्वतमाला से जुड़े सभी पहलुओं की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने का प्रस्ताव रखा था।
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