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High Court : एक तिहाई से ज्यादा संपत्ति की वसीयत नहीं कर सकता मुस्लिम, मालिकाना हक के लिए सभी वारिसों की सहमति

Sat, 21 Mar 2026 01:24 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 21 Mar 2026 01:24 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम विधि से जुड़े वसीयत कानून पर अहम फैसला सुनाया है। कहा है कि कोई भी मुस्लिम अपनी कुल संपत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता।

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High Court: A Muslim cannot bequeath more than one-third of his property
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम विधि से जुड़े वसीयत कानून पर अहम फैसला सुनाया है। कहा है कि कोई भी मुस्लिम अपनी कुल संपत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता। यदि वसीयत किसी एक वारिस के पक्ष में की गई है तो वह तब तक प्रभावी नहीं होगी, जब तक कि वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद अन्य सभी कानूनी वारिस स्पष्ट सहमति न दे दें।

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यह फैसला न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने कासगंज निवासी मोहम्मद मुबीन और अन्य की प्रथम अपील खारिज करते हुए दिया। कोर्ट ने कासगंज के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत के उस फैसले पर मुहर लगा दी जिसमें वादियों के मालिकाना हक के दावे और विपक्षी अन्य वारिसों की ओर से निष्पादित विक्रय विलेख को रद्द करने की मांग खारिज कर दी गई थी।
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मोहम्मद मुबीन के पिता मोहम्मद अनस और मोहम्मद परवेज के पिता मोहम्मद इलियास पार्टनर थे। अपील के मुताबिक वादी मोहम्मद मुबीन, मोहम्मद परवेज ने दावा किया था कि मोहम्मद अनस और मोहम्मद इलियास ने मरने से पहले उनके पक्ष में वसीयत की थी। इससे वे कासगंज स्थित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और अन्य संपत्तियों के पूर्ण स्वामी बन गए थे।

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उन्होंने विपक्षी अन्य भाई-बहनों की ओर से बाहरी व्यक्तियों को बेची गई जमीन के विक्रय विलेख को अवैध बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने पाया कि जब मोहम्मद इलियास की वसीयत 2016 में तैयार हुई, जबकि उनके घनिष्ठ मित्र मोहम्मद अनस की मृत्यु 2015 में हो चुकी थी। वसीयत में उन्हें जीवित और संपत्ति का आधा स्वामी दिखाया गया। यह विरोधाभास वसीयत को फर्जी साबित करने के लिए पर्याप्त था।

साथ ही यह भी पाया कि वसीयतकर्ता उन संपत्तियों (कोल्ड स्टोरेज, टेक्सटाइल्स) के अकेले मालिक नहीं थे, बल्कि उनमें कई अन्य साझेदार भी थे। ऐसे में वे पूरी संपत्ति की वसीयत नहीं कर सकते थे।इसके अलावा वादियों ने अपनी बहनों और मां को मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया था, जिसे कोर्ट ने गंभीर कानूनी चूक माना। लिहाजा, कोर्ट ने वसीयत को संदिग्ध मान अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मुस्लिम कानून के तहत वसीयत केवल एक तिहाई हिस्से तक सीमित है। वारिस के पक्ष में वसीयत होने पर अन्य वारिसों की मौन सहमति पर्याप्त नहीं है, उनकी स्पष्ट मंजूरी अनिवार्य है।

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