जेंडर चेंज: मुझे लड़की मत कहाे- मैं बेटी नहीं बेटा हूं, Colvin अस्पताल में आ चुके जेंडर डिस्फोरिया के कई मामले
मोतीलाल नेहरू मंडलीय चिकित्सालय में जेंडर डिस्फोरिया के शिकार कई लड़कियों की काउंसलिंग की जा रही है। यह बेटियां लड़कों जैसा दिखना चाहती हैं और लड़कों के जैसा ही व्यवहार कर रही हैं। लंबे समय से इनके व्यवहार में परिवर्तन देख परिवार के लोग भी हैरान हैं। डॉक्टर इसका उपचार कर रहे हैं।
विस्तार
केस -1- गांव में रहने वाली 18 वर्षीय इंटरमीडिएट की छात्रा बचपन से ही लड़कों की तरह बर्ताव करती थी। घर वालों ने उसकी इस आदत पर ध्यान नहीं दिया। कुछ समय पहले मां ने उसका मोबाइल फोन देखा तो व्हाट्स एप पर चैटिंग देखकर हैरान रह गईं। इसमें वह लड़का बनकर एक लड़की से लंबे समय से बातें किया करती थी। डरी-सहमी मां उसे कॉल्विन अस्पताल लाईं। यहां छात्रा ने बताया कि वह खुद को लड़की नहीं समझती। हर हाल में लड़का बनना चाहती है। फिलहाल उसकी काउंसिलिंग हो रही है।
केस-2 - अशोक नगर इलाके की रहने वाली 21 वर्षीय युवती को बचपन से ही लड़कों के साथ खेलना, रहना, बर्ताव करना और उनकी तरह ही कपड़े पहनना पसंद था। वह गूगल पर लड़की से लड़का बनने की कई साइट भी सर्च किया करती थी। इस बीच उसके भाई को उसकी इस गूगल सर्च के बारे में पता चल गया। भाई ने पूछताछ की तो उसने दो-टूक कह दिया कि वह लड़की बनकर नहीं रहना चाहती है। घबराए घर वाले उसे डॉक्टर के पास ले गए। काउंसिलिंग के बाद उसे समझ आने लगा है कि वह गलत थी।
केस-3 - बचपन से बोलने में असमर्थ धूमनगंज क्षेत्र की एक इंटरमीडिएट की छात्रा लड़कों की तरह व्यवहार करती थी। हालांकि, बोल न पाने के कारण उसके मन में क्या चल रहा है, यह कोई समझ नहीं पाता था। हालांकि, घरवालों को उसका लड़कों की तरह व्यवहार अजीब लगता था। असल समस्या आई जब स्कूल में दाखिला हुआ। कुछ समय बाद उसने स्कर्ट-टॉप पहनना छोड़कर पैंट शर्ट पहनने लगी। इंटरमीडिएट तक कोई सुधार नहीं होने पर घर वाले उसे कॉल्विन अस्पताल लाए। फिलहाल उसका इलाज चल रहा है।
मोती लाल नेहरू मंडलीय चिकित्सालय (कॉल्विन) में ऐसे 10 से अधिक मामले आ चुके हैं, जिसमें लड़कियां खुद को बेटी नहीं, बल्कि बेटा कहलाना चाहती हैं। बेटे जैसा बनकर रहना चाहती हैं। उनकी इस आदत से घर वाले बेहद परेशान हैं। इलाज करा रहे हैं। मनोचिकित्सकों के मुताबिक यह मानसिक रोग जेंडर डिस्फोरिया है। ऐसे मरीजों की काउंसलिंग की जाती है। तनाव न घटे तो एंटी डिप्रेशन दवाएं भी दी जाती हैं।
ऐसी लड़कियां जेंडर परिवर्तन कराकर लड़का बनने की जिद भी करती हैं। उन्हें लड़कियों से दोस्ती करना या उनके साथ रहना भी नहीं सुहाता। इससे घर का माहौल खराब होता है। डॉक्टरों के मुताबिक यह एक मनोरोग है, इसलिए उनकी जिद तात्कालिक ही होती है। कुछ माह की काउंसिलिंग करके इस मनोवृत्ति को बदला जा सकता है। दरअसल, जेंडर चेंज आसान नहीं है।
कैसे होता है जेंडर चेंज
इस प्रक्रिया में तकरीबन डेढ़ साल का समय लगता है। इसके लिए न्यूरोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक, प्लास्टिक सर्जन और स्त्री रोग विशेषज्ञ का पैनल मरीज की काउंसिलिंग करता है। काउंसिलिंग के आठ से दस सेशन होते हैं। मनोकित्सक की मुहर के बाद ही जेंडर चेंज की प्रक्रिया शुरू होती है। करीब छह माह तक हार्मोंस बदलने की प्रक्रिया चलती है। फिर, सर्जरी की जाती है, जिसकी प्रक्रिया बेहद जटिल है। प्रयागराज में अभी तक सिर्फ एक ही जेंडर चेंज हुआ है।
पिछले साल मैंने सर्जरी करके एक लड़की को लड़का बनाया था। यह काम कठिन है और प्रक्रिया बेहद जटिल। सर्जरी के पहले मरीज की लंबी काउंसिलिंग की जाती है। - डॉ. मोहित जैन, विभागाध्यक्ष, प्लास्टिक सर्जरी विभाग।
हमारे मन कक्ष में साल भर में 10 से अधिक मामले आ चुके हैं। लड़की जिद पकड़े होती है कि उसे तो बस लड़का ही बनना है। असल में यह मनोरोग है, जिसका इलाज संभव है। -डॉ. राकेश पासवान, मनोचिकित्सक