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Court News : जमीन के नामांतरण मामले में एसडीएम और तहसीलदार का आदेश निरस्त
Wed, 11 Feb 2026 03:51 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 11 Feb 2026 03:51 PM IST
सार
राजस्व परिषद ने जमीन के नामांतरण मामले में तहसीलदार और एसडीएम के आदेश को रद्द कर मामले को दोबारा सुनवाई के लिए तहसीलदार न्यायालय को भेज दिया है।
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अदालत (सांकेतिक)
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजस्व परिषद ने जमीन के नामांतरण मामले में तहसीलदार और एसडीएम के आदेश को रद्द कर मामले को दोबारा सुनवाई के लिए तहसीलदार न्यायालय को भेज दिया है। साथ ही चार माह में नया निर्णय देने का निर्देश दिया है। यह आदेश राजस्व परिषद के सदस्य (न्यायिक) साहब सिंह ने जसवंत सिंह की ओर से दायर निगरानी याचिका पर दिया।
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जसवंत सिंह उर्फ यशवंत सिंह का आरोप है कि चार जनवरी-2023 को नहुष कुमार से जमीन के 1/5 हिस्से का पंजीकृत बैनामा कराया था। इसके आधार पर उन्होंने तहसीलदार भोगनीपुर के यहां नामांतरण (राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज कराने) के लिए आवेदन किया। तहसीलदार ने 30 सितंबर 2024 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि कानपुर देहात के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने नौ अप्रैल 2024 को विवादित भूमि पर हस्तांतरण और निर्माण पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है।
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एसडीएम ने 30 दिसंबर 2025 को अपील भी खारिज कर दी और तहसीलदार के आदेश को सही ठहराया। याची की ओर से दलील दी गई कि संबंधित जमीन पहले संयुक्त हिंदू परिवार की थी पर परिवार में बंटवारा हो चुका है। सभी सदस्य अपने-अपने हिस्से पर काबिज हैं। नहुष कुमार ने अपने हिस्से का विधिवत पंजीकृत विक्रय विलेख उनके पक्ष में किया है।
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सिविल कोर्ट के नौ अप्रैल 2024 के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 10 फरवरी 2025 को हस्तांतरण रोकने की सीमा तक स्थगित कर दी है। केवल इस आधार पर सिविल मामला लंबित है, नामांतरण आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता। विपक्षी को ओर से दलील दी गई कि विवादित भूमि संयुक्त परिवार की कृषि भूमि है और उसका अभी विधिवत बंटवारा नहीं हुआ है। उनका नाम राजस्व अभिलेखों में सह-खातेदार के रूप में दर्ज है।
संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में किसी सदस्य को अपना हिस्सा बेचने से पहले अन्य सदस्यों को प्रस्ताव देना चाहिए। इस संबंध में सिविल न्यायालय में वाद लंबित है और यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी पारित है। परिषद ने कहा कि नामांतरण का अधिकार क्षेत्र तहसीलदार को प्राप्त है और केवल सिविल वाद लंबित होने के आधार पर नामांतरण की कार्यवाही स्वतः खारिज नहीं की जा सकती।
परिषद ने तहसीलदार और एसडीएम के आदेश को निरस्त कर दिया। मामले को पुनः सुनवाई के लिए तहसीलदार के पास भेज दिया। निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को सुनकर चार महीने के भीतर नया निर्णय किया जाए। साथ ही कहा कि पूरी कार्यवाही इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामले के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी।