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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Companies are not living up to the standard of Teknokrets

कंपनियों के मानक पर खरे नहीं उतर रहे टेक्नोक्रेट्स

Mon, 24 Aug 2015 02:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Mon, 24 Aug 2015 02:06 AM IST
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इलाहाबाद (ब्यूरो)। रेलवे में चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए हुई भर्ती परीक्षा के नतीजे नीति नियंताओं की चिंता बढ़ाने वाले हैं। कुछ साल पहले ही लाखाें रुपये वार्षिक पैकेज का पर्याय बन चुके एमबीए, एमटेक जैसे कोर्सेज की पढ़ाई करने वाले युवा भी यह नौकरी करने के लिए तैयार हैं। बीटेक तो दूर एमटेक  की पढ़ाई करने वाले युवा भी कंपनियों के मानक पर खरा नहीं उतर रहे।
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इसके पीछे पढ़ाई का गिरता स्तर मुख्य वजह है। चिंता बढ़ाने वाली इस स्थिति के लिए निजी कालेज अधिक जिम्मेदार हैं और उन्हीं की वजह से इन पाठ्यक्रमों की अहमियत कम हुई है। ज्यादातर इंजीनियरिंग कालेजों में पढ़ाई की जिम्मेदारी जिन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली उनके ऊपर है। स्थिति यह है कि एमटेक डिग्रीधारी ही एमटेक के विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं तो इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर भी न्यूनतम मानक पूरे नहीं हैं। इसका नतीजा है कि एमटेक की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं का इंजीनियर बनना या रिसर्च लैब में जाना तो दूर वे चपरासी की भर्ती परीक्षा में भी फेल हो जा रहे हैं।
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एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेज के निदेशक का कहना है कि उत्तर प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय (यूपीटीयू) सिर्फ परीक्षा कराने वाली संस्था बन गया है। शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं है। न्यूनतम मानक पूरा न करने वाले कालेजों में बीटेक की पढ़ाई की अनुमति दे दी गई है। उन्हीं कालेजों में एमटेक की पढ़ाई की भी अनुमति दे दी गई। इलाहाबाद की ही बात करें तो एक इंजीनियरिंग कालेज में मात्र दो शिक्षक पीएचडीधारक हैं। कई शिक्षक तो मात्र बीटेक हैं। कमोवेश यही स्थिति प्रदेश के ज्यादातर कालेजों में है।
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इसके अलावा डीम्ड और निजी विश्वविद्यालयों में कई विषयों में एमटेक की पढ़ाई होती है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकेल्टी की स्थिति काफी खराब है। इलाहाबाद में कई संस्थान दो से तीन कमरों में चल रहे हैं। वहां एमसीए, एमटेक की डिग्री दी जा रही है। खास यह कि संस्थान दूसरे राज्य में स्थिति यूनिवर्सिटी की डिग्री देने का दावा करते हैं, जबकि यूजीसी ने ऐसी डिग्री को अवैध करार दिया है। गुणवत्ता को लेकर चिंतित आल इंडिया काउंसिल ऑफ टेकिभनकल एजुकेशन (एआईसीटीई) की ओर से भी तकनीकी संस्थानों का निरीक्षण कराने के साथ सुधार के लिए सुझाव दिए गए, लेकिन स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जेके इंस्टीट्यूट के डॉ.एनके शुक्ला का कहना है कि केंद्रीय संस्थानों के एमटेक कोर्स में आल इंडिया स्तर पर होने वाली परीक्षा (गेट) के आधार पर प्रवेश होता है, लेकिन राज्य विश्वविद्यालय से जुड़े कालेजों तथा निजी विश्वविद्यालयों में खुद के स्तर पर परीक्षा कराई जाती है। इसके विपरीत संस्थानों की तुलना में छात्र-छात्राओं की संख्या काफी कम हो गई है। ऐसे में प्रवेश परीक्षा में शामिल होना मात्र ही एडमिशन की अर्हता हो गई है। स्किल्ड छात्र नहीं मिल रहे।

बीबीएस इंजीनियरिंग कालेज के डॉ.सीपी सिंह का कहना है कि एमटेक छात्र खलासी बनने के लिए तैयार हैं यह काफी चौंकाने वाली बात है। यह हर स्तर पर खामी का नतीजा है। इसके अलावा टूजी स्पेक्ट्रम विवाद के एक बड़े सेक्टर के दरवाजे छात्र-छात्राओं के लिए बंद हो गए। अब नीति नियंताओं पर इस पर सोचना चाहिए कि बीटेक और एमटेक की पढ़ाई का यही मकसद है। देव प्रयाग इंजीनियरिंग के एससी रोहतगी का कहना है कि एमटेक के छात्र-छात्राओं के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं। प्राइवेट कालेजों में भी एमटेक शुरू कर दिया गया है लेकिन फैकेल्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर ध्यान नहीं दिया गया। सभी पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।


बीटेक के बाद एमटेक कोर्स का तिलिस्म भी टूटने लगा है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (एनआईटी) में भी बीटेक और एमटेक की सीटें खाली रह गईं। इसकी वजह से पहली बार दोबारा काउंसलिंग का फैसला लेना पड़ा। उत्तर प्रदेश के तकनीकी संस्थानों की तो काफी चिंताजनक स्थिति है। यूपीटीयू से जुड़े कालेजों में बीटेक की तकरीबन सवा लाख सीट है लेकिन मात्र 20 फीसदी सीट ही भरी। ज्यादातर कालेजों के कई पाठ्यक्रमों दाखिले की स्थिति शून्य है। एमटेक में तो विद्यार्थी दाखिला लेने के लिए ही नहीं आए। यूपीटीयू की ओर से काउंसलिंग कराके सीट एलाट कर दी गई, लेकिन विद्यार्थी कालेज में रिपोर्टिंग के लिए नहीं पहुंचे। एक सरकारी इंजीनियरिंग कालेज में भी रिपोर्टिंग के लिए कोई छात्र नहीं पहुंचा। इलाहाबाद के एक इंजीनियरिंग कालेज में मात्र चार विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। जबकि, 25 अगस्त आखिरी तारीख है।
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