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Prayagraj : या अली या हुसैन की सदाओं से गूंजा शहर, कड़ी सुरक्षा के बीच निकले ताजिए, रास्ते भर पिलाए गए शर्बत

Wed, 17 Jul 2024 05:29 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 17 Jul 2024 05:29 PM IST
सार

माहे मुहर्रम की दसवीं को अकीदत के फूल दफन किए जाते हैं। हजारों लाखों शहीदों की शहादत के बाद जब जाकर इस्लाम पूरी दुनिया में फैला है। रसूल के नवासे हसन हुसैन की शहादत मना रहे हैं। सुबह से ही मेहंदी के फूल ताजियादार कर्बला में दफन करने के लिए निकल पडते हैं। 

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city echoed with the memories of Ali or Hussain, refreshments were served amid tight security
ताजिया जुलूस में उमड़ी भीड़। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

या अली या हुसैन की सदाओं के बीच बुधवार को ताजिए निकाले  गए। अटाला, खुल्दाबाद, नूरउल्लाह रोड, घंटाघर, जानसेनगंज, विवेकानंद मार्ग, जीरो रोड, कर्बला आदि इलाकों में ताजिया जुलूस निकाला गया। जगह-जगह शर्बत, ठंडा पानी, हलवा, नमकीन, मिठाइ और बिरयानी का वितरण किया गया। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक बंदोबस्त किया गया था। जुलूस के चलते शहर के कई इलाकों में ट्रैफिक डावर्जन किया गया। इसके चलते लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

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माहे मुहर्रम की दसवीं को अकीदत के फूल दफन किए जाते हैं। हजारों लाखों शहीदों की शहादत के बाद जब जाकर इस्लाम पूरी दुनिया में फैला है। रसूल के नवासे हसन हुसैन की शहादत मना रहे हैं। सुबह से ही मेहंदी के फूल ताजियादार कर्बला में दफन करने के लिए निकल पडते हैं। बुड्ढा ताजिया अपने वक्त के मुताबिक उठाया जाता है। हुसैन के सौदाई अपने कंधों पर ताजिया लेकर चल पड़ते हैंं। मुस्तफा काम्प्लैक्स बैरियर पर गश्त कराया जाता है। पानी, शरबत का पूरे रास्ते इंतजाम रहा। लंगर हो रहे थे। बड़े इत्मीनान से लोग लंगर ले रहे थे।
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बुड्ढा ताजिया, खुल्दाबाद बैरियर पहुंचता है। यहां पर अचानक भीड़ बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। या अली या हुसैन के सदाएं गूंजने लगती है। कंधा देने वालों की तादाद बढ़ जाती है। ताजिया अपने मंजिले मकसूद कर्बला के जानीब धीरे-धीरे  बढ रहा था। दसवीं मोहर्रम  को बड़े ताजिया पर सुबह से भीड़ थी खाने पीने की दुकान लगी थी मिठाई और फूल बिक रहे थे। औरतें मन्नते मांग रही थीं। फातिया हो रही थी। लंगर की चीज लोगों को हाथों में दिया जा रहा था।

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ताजिया इमाम बाडे, रख दिया जाता है। अकीदत के फूल से ताजिया भर जाता है। ताजिया उठने का वक्त हो जाता है। जोहर की नमाज के बाद ताजिया या अली या हुसैन लब्बैक या हुसैन के बुलंद नारे के साथ ताजिया उठाया जाता है। मकान और छत्तो से फूल बरसाए जाते हैं। बड़े ताजिया में गश्त करने के बाद। ताजिया जॉनसेन गंज की रोड पर आता है। हुसैनी सैलाब उमड़ पड़ता है। औरतें जियारत के लिए बेचैन थीं। बच्चों को बोबोसा कराया जा रहा था। कंधा देने वालों  पर पानी के फव्वारे, गुलाब जल केवड़ा बरसाए जा रहे थे। बड़ी तादाद में औरतें ताजिया का दीदार करने आई थीं उनकी आंखें नम थीं। बड़ा ताजिया गश्त करते हुए जानसेन गंज चौराहे की तरफ बढ़ रहा था। 

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