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Aligarh News: एक नाव के भरोसे दस गांव... 30 हजार जिंदगियां
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अकराबाद के काैड़ियागंज इलाके में काली नदी किनारे बसे 10 गांव में करीब 30 हजार की आबादी रहती है। इन गांवों में रहने वालों के जीवन-यापन के लिए हर जरूरी चीज काली नदी के पार मिलती है। नदी पार करने के लिए इन लोगों के पास सबसे नजदीकी साधन एक नाव है। ये सिर्फ नाव नहीं... यहां के लोगों के लिए ये स्कूली वाहन, एंबुलेंस और जन परिवहन का साधन भी है।
ये कहानी है जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर कौड़ियागंज इलाके की। काली नदी इस क्षेत्र से होकर बहती है। नदी के एक तरफ कौड़ियागंज का समृद्ध बाजार, अच्छे स्कूल-कॉलेज, चिकित्सक, अस्पताल, बैंक हैं। दूसरी तरफ अलहैदापुर, पहाड़ीपुर, सिकंदरपुर, दतालवी, परौरा, चांदगढ़ी, लैदापुर, सामंती का नगला, कुशावली, मूलहर जैसे गांव हैं जहां करीब 30 हजार लोग बसते हैं। इन गांवों की तरफ सड़क मार्ग से सबसे नजदीकी बाजार बरला क्षेत्र में पड़ता है, जो करीब 10-12 किमी दूर है। ऐसे में यहां के लोगों को राशन, बर्तन, कपड़े, दवा, इलाज, बैंक संबंधी काम के लिए कौड़ियागंज आना पड़ता है। दिन हो या रात, सामान्य जरूरत हो या आपातकालीन, सभी की पूर्ति कौड़ियागंज बाजार से ही होती है।
इसीलिए नाव है यहां की जीवनरेखा
काली नदी पार करने के दो ही तरीके हैं। एक, करीब छह किमी दूर छर्रा में मौजूद पुल। इस पुल से कौड़ियागंज पहुंचने के लिए करीब 12 किमी का चक्कर लगाना पड़ता है। दूसरा, काली नदी में नगर पंचायत की ओर से संचालित एक नाव, जिससे बाजार पहुंचने में बमुश्किल एक किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में यह नाव नदी के एक ओर बसे 10 गांव वालों की जीवनरेखा है।
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दिन हो या रात, रहता हूं तैयार
नाव का संचालन करने वाले महावीर कहते हैं कि मेरे काम का कोई समय नहीं। सुबह से शाम ढलने तक नाव पर ही रहता हूं। लोगों को इधर से उधर ले जाता हूं। सबके पास मेरा मोबाइल नंबर है। रात में कोई बीमार पड़े तो लोग फोन करके बुला लेते हैं। मैं अपने परिवार की चौथी पीढ़ी से हूं जिसके पास ये जिम्मेदारी है। छुट्टी लेनी हो तो परिवार के किसी सदस्य को ये जिम्मेदारी सौंप कर जाना पड़ता है क्योंकि नाव एक दिन भी बंद नहीं हो सकती।
पढ़ना है तो उस पार जाना पड़ेगा नाव पर बाइक और दो बच्चों के साथ कौड़ियागंज की ओर पहुंचे विवेक कहते हैं कि हमारे गांव की ओर प्राथमिक विद्यालय ही है। जूनियर हाईस्कूल या ऊपर की पढ़ाई के लिए सारे बच्चे रोज नाव से ही कौड़ियागंज आते-जाते हैं। हमारी तरफ ऐसे विद्यालय काफी दूर पड़ते हैं।
जो पिता ने झेला, वही मैं झेल रहा हूं
चांदगढ़ी से नाव के सहारे कौड़ियागंज पहुंचे बुजुर्ग भोजराज बताते हैं कि मेरी उम्र हो गई। मेरे पिता ने जो झेला वही मैं भी झेल रहा हूं। हमारी तरफ शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो दिन में दो-चार चक्कर कौड़ियागंज का न लगाता हो। सबके लिए नाव ही सहारा है।
नाव ही हमारे लिए एंबुलेंस है अलहैदपुर निवासी रामवीर सिंह नाव से उतरते ही बोल पड़े कि हमारी तरफ कोई बीमार पड़ जाए तो हम एंबुलेंस नहीं बुलाते। ये नाव ही हमारी एंबुलेंस हैं। मरीज को किसी तरह टांग कर नदी किनारे तक लाते हैं। नाव से कौड़ियागंज के डॉक्टरों के पास ले जाते हैं।
बाढ़ के समय बढ़ती है परेशानी
कौड़ियागंज के बलवीर सिंह बताते हैं कि गर्मी के दिनों में काली नदी की चौड़ाई 30 मीटर तक रह जाती है। बरसात और बाढ़ के समय इसकी चौड़ाई 500 मीटर या इससे भी ज्यादा होती है। तब नाव संचालन में खतरा रहता है। नदी में मगरमच्छों की भरमार है।
नदिया के पार के हालात
10 से ज्यादा गांव हैं कौड़ियागंज में काली नदी के किनारे।
30 हजार से ज्यादा की आबादी परिवहन मामले में विकल्पहीन।
12 किमी का चक्कर लगाना पड़ता है नजदीकी पुल के लिए।
10 किमी तक नहीं है कोई अच्छा अस्पताल और स्कूल।
100 से ज्यादा चक्कर लगाती है नाव रोजाना दोनों तरफ से।
500 मीटर तक चौड़ी हो जाती है नदी बाढ़ के सीजन में।
पुल के लिए नगर पंचायत चेयरमैन कल्पना सिंह लोधी के प्रयास रंग लाए हैं। क्षेत्रीय विधायक वीरेंद्र पाल सिंह और सांसद अनूप वाल्मीकि ने शासन से साढ़े 17 करोड़ का बजट दिलाया है। पुल का निर्माण हाल ही में शुरू हो चुका है। अगले एक-दो वर्ष में इसका निर्माण पूरा हो जाएगा। पुल से बड़ी आबादी को फायदा मिलेगा।
-कुलदीप सिंह लोधी, प्रतिनिधि, नगर पंचायत अध्यक्ष
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ये कहानी है जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर कौड़ियागंज इलाके की। काली नदी इस क्षेत्र से होकर बहती है। नदी के एक तरफ कौड़ियागंज का समृद्ध बाजार, अच्छे स्कूल-कॉलेज, चिकित्सक, अस्पताल, बैंक हैं। दूसरी तरफ अलहैदापुर, पहाड़ीपुर, सिकंदरपुर, दतालवी, परौरा, चांदगढ़ी, लैदापुर, सामंती का नगला, कुशावली, मूलहर जैसे गांव हैं जहां करीब 30 हजार लोग बसते हैं। इन गांवों की तरफ सड़क मार्ग से सबसे नजदीकी बाजार बरला क्षेत्र में पड़ता है, जो करीब 10-12 किमी दूर है। ऐसे में यहां के लोगों को राशन, बर्तन, कपड़े, दवा, इलाज, बैंक संबंधी काम के लिए कौड़ियागंज आना पड़ता है। दिन हो या रात, सामान्य जरूरत हो या आपातकालीन, सभी की पूर्ति कौड़ियागंज बाजार से ही होती है।
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इसीलिए नाव है यहां की जीवनरेखा
काली नदी पार करने के दो ही तरीके हैं। एक, करीब छह किमी दूर छर्रा में मौजूद पुल। इस पुल से कौड़ियागंज पहुंचने के लिए करीब 12 किमी का चक्कर लगाना पड़ता है। दूसरा, काली नदी में नगर पंचायत की ओर से संचालित एक नाव, जिससे बाजार पहुंचने में बमुश्किल एक किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में यह नाव नदी के एक ओर बसे 10 गांव वालों की जीवनरेखा है।
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दिन हो या रात, रहता हूं तैयार
नाव का संचालन करने वाले महावीर कहते हैं कि मेरे काम का कोई समय नहीं। सुबह से शाम ढलने तक नाव पर ही रहता हूं। लोगों को इधर से उधर ले जाता हूं। सबके पास मेरा मोबाइल नंबर है। रात में कोई बीमार पड़े तो लोग फोन करके बुला लेते हैं। मैं अपने परिवार की चौथी पीढ़ी से हूं जिसके पास ये जिम्मेदारी है। छुट्टी लेनी हो तो परिवार के किसी सदस्य को ये जिम्मेदारी सौंप कर जाना पड़ता है क्योंकि नाव एक दिन भी बंद नहीं हो सकती।
पढ़ना है तो उस पार जाना पड़ेगा नाव पर बाइक और दो बच्चों के साथ कौड़ियागंज की ओर पहुंचे विवेक कहते हैं कि हमारे गांव की ओर प्राथमिक विद्यालय ही है। जूनियर हाईस्कूल या ऊपर की पढ़ाई के लिए सारे बच्चे रोज नाव से ही कौड़ियागंज आते-जाते हैं। हमारी तरफ ऐसे विद्यालय काफी दूर पड़ते हैं।
जो पिता ने झेला, वही मैं झेल रहा हूं
चांदगढ़ी से नाव के सहारे कौड़ियागंज पहुंचे बुजुर्ग भोजराज बताते हैं कि मेरी उम्र हो गई। मेरे पिता ने जो झेला वही मैं भी झेल रहा हूं। हमारी तरफ शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो दिन में दो-चार चक्कर कौड़ियागंज का न लगाता हो। सबके लिए नाव ही सहारा है।
नाव ही हमारे लिए एंबुलेंस है अलहैदपुर निवासी रामवीर सिंह नाव से उतरते ही बोल पड़े कि हमारी तरफ कोई बीमार पड़ जाए तो हम एंबुलेंस नहीं बुलाते। ये नाव ही हमारी एंबुलेंस हैं। मरीज को किसी तरह टांग कर नदी किनारे तक लाते हैं। नाव से कौड़ियागंज के डॉक्टरों के पास ले जाते हैं।
बाढ़ के समय बढ़ती है परेशानी
कौड़ियागंज के बलवीर सिंह बताते हैं कि गर्मी के दिनों में काली नदी की चौड़ाई 30 मीटर तक रह जाती है। बरसात और बाढ़ के समय इसकी चौड़ाई 500 मीटर या इससे भी ज्यादा होती है। तब नाव संचालन में खतरा रहता है। नदी में मगरमच्छों की भरमार है।
नदिया के पार के हालात
10 से ज्यादा गांव हैं कौड़ियागंज में काली नदी के किनारे।
30 हजार से ज्यादा की आबादी परिवहन मामले में विकल्पहीन।
12 किमी का चक्कर लगाना पड़ता है नजदीकी पुल के लिए।
10 किमी तक नहीं है कोई अच्छा अस्पताल और स्कूल।
100 से ज्यादा चक्कर लगाती है नाव रोजाना दोनों तरफ से।
500 मीटर तक चौड़ी हो जाती है नदी बाढ़ के सीजन में।
पुल के लिए नगर पंचायत चेयरमैन कल्पना सिंह लोधी के प्रयास रंग लाए हैं। क्षेत्रीय विधायक वीरेंद्र पाल सिंह और सांसद अनूप वाल्मीकि ने शासन से साढ़े 17 करोड़ का बजट दिलाया है। पुल का निर्माण हाल ही में शुरू हो चुका है। अगले एक-दो वर्ष में इसका निर्माण पूरा हो जाएगा। पुल से बड़ी आबादी को फायदा मिलेगा।
-कुलदीप सिंह लोधी, प्रतिनिधि, नगर पंचायत अध्यक्ष