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रोहिंग्याः सुबह छह बजे छापे से मकदूम नगर में मची भगदड़, तीन वर्ष से लगातार जारी हैं छापे

Tue, 25 Jul 2023 04:05 AM IST
चमन शर्मा अभिषेक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़
अभिषेक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: चमन शर्मा Updated Tue, 25 Jul 2023 04:05 AM IST
सार

 म्यांमार से वर्ष 2012 और 2017 में पलायन कर देश में आए रोहिंग्या एक समय में शहर के मीट निर्यात कारोबार की धुरी बन गए। अधिकांश मीट फैक्टरियों में इन्हें काम मिला और काफी संख्या में शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट पर ये यहां रहे। मगर जब से वैध दस्तावेजों के अभाव में इनकी धरपकड़ शुरू हुई, तब से इनका यहां से पलायन शुरू हो गया है।

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Raid at six in the morning created a stampede in Makdum Nagar
गिरफ्तार रोहिंग्या - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

म्यांमार से आकर अलीगढ़ अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या के खिलाफ धरपकड़ का यह पहला मौका नहीं है। शहर में इससे पहले भी कई बार धरपकड़ और गिरफ्तारी अभियान चल चुके हैं। लेकिन पहली बार इतनी संख्या में एक साथ गिरफ्तारी हुई। सोमवार सुबह छह बजे जब पुलिस व एटीएस की टीमों ने एक साथ छापा मारा तो कुछ देर के लिए मकदूम नगर में भगदड़ मच गई। कुछ स्थानीय लोग भी दबोच लिए गए। बाद में स्थानीय लोगों को छोड़कर बाकी लोगों को थाने ले आया गया। इस दौरान पकड़े गए लोगों में से कुछ के बच्चे व बुजुर्ग रह गए हैं। अब वह यहां से जाने का मन बना रहे हैं।

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 म्यांमार से वर्ष 2012 और 2017 में पलायन कर देश में आए रोहिंग्या एक समय में शहर के मीट निर्यात कारोबार की धुरी बन गए। अधिकांश मीट फैक्टरियों में इन्हें काम मिला और काफी संख्या में शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट पर ये यहां रहे। मगर जब से वैध दस्तावेजों के अभाव में इनकी धरपकड़ शुरू हुई, तब से इनका यहां से पलायन शुरू हो गया है। वर्तमान में रिकार्ड के अनुसार, मात्र 57 रोहिंग्या  शरणार्थी कार्ड से रह रहे हैं। वहीं धरपकड़ के चलते अब मीट फैक्टरियों में काम और स्थानीय लोगों से मदद मिलनी बंद हो गई।  
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पिछले कुछ दिनों से एटीएस स्तर से इनकी निगरानी की जा रही थी। इसी बीच पता चला कि कुछ रोहिंग्या लगभग पांच वर्ष पहले और कुछ इसी वर्ष की शुरुआत में यहां आकर रहने लगे हैं, जिनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं हैं। न इनके शरणार्थी कार्ड हैं। जब जांच पूरी हो गई तो इसी आधार पर एक साथ कार्रवाई तय की गई।
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ये है कानून 
रिफ्यूजी एक्ट 1951 पर हस्ताक्षर न होने के कारण बिना शरणार्थी कार्ड के इनका यहां रहना वैध नहीं है। कोई दस्तावेज मिलता है तो धोखाधड़ी की धारा में मुकदमा दर्ज होता है अन्यथा बिना कागज के रहने पर विदेशी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज होता है, जिसमें 3 माह से 8 वर्ष तक की कैद का प्रावधान है। इसके अलावा, जमानत पर उन्हें उनके देश की सीमा पर छोड़ने का प्रावधान है। अगर उनके देश की सरकार उन्हें अपना मानती है तो अन्यथा उन्हें डिटेंशन सेंटर या किसी की निगरानी में रखने का प्रावधान है।

इनके मकानों में किराये पर थे रोहिंग्या 

हाजी जी पीपलवाली गली मकदूमनगर, राशिक का मकान मकदूमनगर, राशिद का मकान पीपल के पेड के पास मकदूमनगर, सादाब कामरान बनिया वाली गली मकदूमनगर, आमिर का मकान मकदूमनगर, आकिल के मकान में मंदा गली मकदूमनगर।

मददगार व दस्तावेज बनवाने वाले दलाल रडार पर
रोहिंग्या को यहां ठिकाना बताने वाले, रहने में मदद करने वाले और अवैध रूप से दस्तावेज बनवाने वाले दलाल अब एजेंसियों के रडार पर आ गए हैं। जिन लोगों के मकानों में ये लोग किराये पर रहते पाए गए हैं, उनको कार्रवाई की जद में लाया जा सकता है।

तीन वर्ष से लगातार छापे जारी... गिरफ्तारी
अलीगढ़ शहर में पिछले तीन वर्ष से रोहिंग्या की धरपकड़ के लिए लगातार छापे मारे जा रहे हैं, उनकी गिरफ्तारी भी हो रही है। इनमें से कुछ के पास से शहर के पते का आधार कार्ड, किसी के पास फर्जी तरीके से बना पासपोर्ट तक मिला है। पिछले वर्ष एक गिरफ्तारी के समय में सोना तस्करी का आरोप एक रोहिंग्या पर लगा था, जिसे एटीएस लखनऊ ले गई थी। पुलिस रिकार्ड के अनुसार, शहर से वर्ष 2021 में 19 जुलाई को कोतवाली क्षेत्र से एक, इसी दिन रोरावर से एक, अगस्त में रोरावर से दो, फरवरी से एक गिरफ्तारी हुई थी।

चार वर्ष पहले तक थे एक हजार रोहिंग्या, कइयों ने बनवा लिए पासपोर्ट, आधार कार्ड  
खास बात यह है कि अलीगढ़ में चार वर्ष पहले तक एक हजार से अधिक रोहिंग्या थे। एक एनजीओ के सर्वे के अनुसार, ये लोग यहां मीट फैक्टरियों से आजीविका चलाने के लिए आकर रहे। शुरुआत में करीब 25-30 रोहिंग्या वर्क परमिट के आधार पर शहर की मीट फैक्टरियों में काम करने लगे। इन्हें पशु कटान के कार्य में दक्ष माना जाता है। धीरे-धीरे बाकी भी यहां इन्हीं कारखानों में रोजगार पा गए। जब इनके खिलाफ मुद्दा उठा और जांच शुरू हुई तो पता चला कि बहुतों ने यहां आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, राशन कार्ड आदि तक बनवा लिए। एक समय में चंद परिवार गोंडा रोड के कमेला व गोंडा रोड के बाईपास की मीट फैक्टरियों में ही रहा करते थे। धीरे-धीरे मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और मीट कारोबार से जुड़े स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखना शुरू कर लिया। इसके बाद भुजपुरा व शाहजमाल में भी रहे। मगर जब से धरपकड़ शुरू हुई, तब से इनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है।

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