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Aligarh News: गंगा में हर साल 17 फीसदी तक बढ़ रहे दुर्लभ कछुए
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सांकरा में गंगा किनारे कछुए।
- फोटो : samvad
गंगा के सांकरा क्षेत्र में दुर्लभ और संरक्षित प्रजाति के इंडियन थ्री स्ट्राइप्ड रूफ्ड टर्टल इन दिनों चहलकदमी कर रहे हैं। अच्छी बात ये है कि हर साल इनकी संख्या लगभग 17 फीसदी के औसत से बढ़ रही है।
जिला गंगा समिति के सदस्य ज्ञानेश शर्मा कहते हैं कि तीन साल पहले इनकी संख्या 500 के आसपास थी, जो अब लगभग 800 तक पहुंच चुकी है। रविवार को विश्व नदी दिवस के मौके पर स्थानीय लोगों को गंगा और कछुओं का महत्व बताया गया।
इन दिनों मादा कछुआ अंडे देने के लिए सुरक्षित स्थानों की तलाश कर रही हैं। यह स्थान गंगा से सटे हुए इलाके हैं, जहां पेड़ों और झाड़ियों के बीच मादा अक्तूबर से नवंबर के बीच में अंडे देंगी।
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यह कछुआ वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के शेड्यूल-एक में सुरक्षित घोषित हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के स्थानीय अधिकारी ने बताया कि गंगा इनका पसंदीदा क्षेत्र है। यहां मिलने वाले फल, फूल, फसलों के अवशेष इनका पसंदीदा आहार हैं।
संरक्षित घोषित होने के कारण इन्हें सुरक्षित प्रवास उपलब्ध कराया जाता है, जिससे इनकी आबादी बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि यह पर्यावरण संतुलन के अच्छे संकेत हैं। यह गंगा का सहायक जीव है, जो उसकी सफाई करने में मदद करता है। अलीगढ़ के टोडरपुर गांव में भी इनका संरक्षण किया जाता है।
इंडियन थ्री स्ट्राइप्ड रूफ्ड टर्टल को स्थानीय भाषा में तीन धारीदार छत वाला कछुआ भी कहा जाता है। इसके ऊपरी सख्त खोल (कैरापेस) पर तीन विशिष्ट अनुदैर्ध्य (लंबी) धारियां बनी होती हैं। यह कछुओं की बड़ी प्रजाति है, जिसकी लंबाई 70 सेमी और वजन 10 से 20 किलो तक हो सकता है। इसका थूथन छोटा और नुकीला होता है। इनके पैर जालीदार और पंजे लंबे होते हैं, जो तैरने में मदद करते हैं।
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जिला गंगा समिति के सदस्य ज्ञानेश शर्मा कहते हैं कि तीन साल पहले इनकी संख्या 500 के आसपास थी, जो अब लगभग 800 तक पहुंच चुकी है। रविवार को विश्व नदी दिवस के मौके पर स्थानीय लोगों को गंगा और कछुओं का महत्व बताया गया।
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इन दिनों मादा कछुआ अंडे देने के लिए सुरक्षित स्थानों की तलाश कर रही हैं। यह स्थान गंगा से सटे हुए इलाके हैं, जहां पेड़ों और झाड़ियों के बीच मादा अक्तूबर से नवंबर के बीच में अंडे देंगी।
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यह कछुआ वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के शेड्यूल-एक में सुरक्षित घोषित हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के स्थानीय अधिकारी ने बताया कि गंगा इनका पसंदीदा क्षेत्र है। यहां मिलने वाले फल, फूल, फसलों के अवशेष इनका पसंदीदा आहार हैं।
संरक्षित घोषित होने के कारण इन्हें सुरक्षित प्रवास उपलब्ध कराया जाता है, जिससे इनकी आबादी बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि यह पर्यावरण संतुलन के अच्छे संकेत हैं। यह गंगा का सहायक जीव है, जो उसकी सफाई करने में मदद करता है। अलीगढ़ के टोडरपुर गांव में भी इनका संरक्षण किया जाता है।
इंडियन थ्री स्ट्राइप्ड रूफ्ड टर्टल को स्थानीय भाषा में तीन धारीदार छत वाला कछुआ भी कहा जाता है। इसके ऊपरी सख्त खोल (कैरापेस) पर तीन विशिष्ट अनुदैर्ध्य (लंबी) धारियां बनी होती हैं। यह कछुओं की बड़ी प्रजाति है, जिसकी लंबाई 70 सेमी और वजन 10 से 20 किलो तक हो सकता है। इसका थूथन छोटा और नुकीला होता है। इनके पैर जालीदार और पंजे लंबे होते हैं, जो तैरने में मदद करते हैं।