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सामने थे सैकड़ों दुश्मन फिर भी न डिगे कदम
Wed, 24 Jul 2019 02:06 AM IST
राजेश सिंह
न्यूूज डेस्क, धर्मवीर सिंह, अलीगढ़।
न्यूूज डेस्क, धर्मवीर सिंह, अलीगढ़।
Published by: राजेश सिंह
Updated Wed, 24 Jul 2019 02:06 AM IST
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नरेश सिनसिनवार शहीद का स्मारक स्थल।
- फोटो : Amar Ujala
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चरवाहे के जरिए सबसे पहले सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली पेट्रोलिंग टीम को कारगिल की ऊंची चोटियों पर बने बंकरों में दुश्मनों की मौजूदगी की पहली खबर मिली। इस पर दुश्मनों की बड़ी तादाद की तनिक भी परवाह न करते हुए आगे बढ़ गई थी छह सैनिकों की यह टुकड़ी दुश्मनों से मोर्चा लेने। इसी टुकड़ी में शामिल थे गोंडा क्षेत्र के गांव छोटी बल्लम निवासी वीर योद्धा नरेश सिनसिनवार। शत्रुओं ने अधिक संख्या होने के कारण घेरकर उन्हें पकड़ लिया। नरेश सिनसिनवार समेत सभी छह सैनिकों के अंग-अंग विच्छेदन करने के बावजूद अंतिम सांस तक शत्रु सेना का एक भेद न पा सका।
राजेंद्र सिंह व रूपवती देवी के छोटे पुत्र नरेश सिनसिनवार 28 फरवरी 1992 को आगरा से सेना में भर्ती हुए थे। गांव के निवासी और उनके पारिवारिक मित्र वीरेंद्र सिंह फौजदार बताते हैं कि मई के महीने में कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली 6 सैनिकों की टुकड़ी में नरेश सिनसिनवार भी शामिल थे। जब यह टुकड़ी कारगिल की चोटियों पर पहुंची तो वहां पाक सैनिकों से घिर गई, फिर भी सभी जवान दिलेरी से दुश्मन से लड़े। दुश्मन ने इन सभी जवानों को पकड़ने के बाद बेहद क्रूरता दिखाई लेकिन इन वीरों ने देश का एक भी भेद दुश्मन के सामने जाहिर न किया।
नरेश का विवाह अतरौली तहसील के गांव महके निवासी कल्पना के साथ 28 अप्रैल 1996 को हुआ था। तिरंगे में लिपटा उनका शव जब गांव पहुंचा तो हजारों का जनसैलाब उमड़ पड़ा था। मां, बहन व पत्नी का करुण क्रंदन सुनकर हर आंख छलक पड़ी थी। जिस स्थान पर वह पंचतत्व में विलीन हुए उसी स्थान पर स्मृति स्थल बना है। नरेश ने अपनी वीर वंश परंपरा को वीर गोकुला की भांति शहादत देकर निभाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी शहीद को अंतिम विदाई देने गांव आए थे।
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दो कमरों वाले मकान में माता-पिता का गुजर बसर
वीर नरेश की शहादत के बाद ही पत्नी कल्पना देवी अपने मायके चली गई थी। शहीद को मिले पेट्रोल पंप का संचालन कल्पना के मायके वाले ही करते हैं। पिता राजेंद्र सिंह व मां रूपवती तंग गलियों में दो कमरे और एक बरामदे वाले घर में गुजर बसर कर रहे हैं। शहीद के बड़े भाई विनोद कुमार बचपन से ही अपनी ननिहाल में रहते हैं। हामिदपुर में इस समय वह परिवार समेत रह रहे हैं। पिता राजेंद्र सिंह के पास 10 बीघे जमीन है उसी से परिवार का गुजर बसर हो रहा है। छोटे बेटे की शहीद होने, बहू के मायके चले जाने और बड़े बेटे के दूसरी जगह रहने से बुजुर्ग माता-पिता एकाकी जीवन जी रहे हैं पर उन्हें गर्व है कि उनके लाल ने माटी का कर्ज उतार दिया। उन्हें ढाई हजार रुपए की जो पेंशन मिलती थी वह भी 9 माह से नहीं मिली।
स्कूल में प्रतिमा स्थापना का प्रयास
शहीद स्मारक स्थल पर वीर योद्धा नरेश की वीरगाथा कविता के रूप में शिला पट्टिका पर अंकित है। शहीद नरेश के नाम से वैदिक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पर प्रवेश द्वार बना है। स्कूल में शहीद की प्रतिमा स्थापित कराने का प्रयास है। इसके साथ ही शहीद के गांव में सुविधाओं की कमी पर क्षोभ भी लोगों को है। बिजली को लेकर नाराजगी है।
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राजेंद्र सिंह व रूपवती देवी के छोटे पुत्र नरेश सिनसिनवार 28 फरवरी 1992 को आगरा से सेना में भर्ती हुए थे। गांव के निवासी और उनके पारिवारिक मित्र वीरेंद्र सिंह फौजदार बताते हैं कि मई के महीने में कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली 6 सैनिकों की टुकड़ी में नरेश सिनसिनवार भी शामिल थे। जब यह टुकड़ी कारगिल की चोटियों पर पहुंची तो वहां पाक सैनिकों से घिर गई, फिर भी सभी जवान दिलेरी से दुश्मन से लड़े। दुश्मन ने इन सभी जवानों को पकड़ने के बाद बेहद क्रूरता दिखाई लेकिन इन वीरों ने देश का एक भी भेद दुश्मन के सामने जाहिर न किया।
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नरेश का विवाह अतरौली तहसील के गांव महके निवासी कल्पना के साथ 28 अप्रैल 1996 को हुआ था। तिरंगे में लिपटा उनका शव जब गांव पहुंचा तो हजारों का जनसैलाब उमड़ पड़ा था। मां, बहन व पत्नी का करुण क्रंदन सुनकर हर आंख छलक पड़ी थी। जिस स्थान पर वह पंचतत्व में विलीन हुए उसी स्थान पर स्मृति स्थल बना है। नरेश ने अपनी वीर वंश परंपरा को वीर गोकुला की भांति शहादत देकर निभाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी शहीद को अंतिम विदाई देने गांव आए थे।
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दो कमरों वाले मकान में माता-पिता का गुजर बसर
वीर नरेश की शहादत के बाद ही पत्नी कल्पना देवी अपने मायके चली गई थी। शहीद को मिले पेट्रोल पंप का संचालन कल्पना के मायके वाले ही करते हैं। पिता राजेंद्र सिंह व मां रूपवती तंग गलियों में दो कमरे और एक बरामदे वाले घर में गुजर बसर कर रहे हैं। शहीद के बड़े भाई विनोद कुमार बचपन से ही अपनी ननिहाल में रहते हैं। हामिदपुर में इस समय वह परिवार समेत रह रहे हैं। पिता राजेंद्र सिंह के पास 10 बीघे जमीन है उसी से परिवार का गुजर बसर हो रहा है। छोटे बेटे की शहीद होने, बहू के मायके चले जाने और बड़े बेटे के दूसरी जगह रहने से बुजुर्ग माता-पिता एकाकी जीवन जी रहे हैं पर उन्हें गर्व है कि उनके लाल ने माटी का कर्ज उतार दिया। उन्हें ढाई हजार रुपए की जो पेंशन मिलती थी वह भी 9 माह से नहीं मिली।
स्कूल में प्रतिमा स्थापना का प्रयास
शहीद स्मारक स्थल पर वीर योद्धा नरेश की वीरगाथा कविता के रूप में शिला पट्टिका पर अंकित है। शहीद नरेश के नाम से वैदिक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पर प्रवेश द्वार बना है। स्कूल में शहीद की प्रतिमा स्थापित कराने का प्रयास है। इसके साथ ही शहीद के गांव में सुविधाओं की कमी पर क्षोभ भी लोगों को है। बिजली को लेकर नाराजगी है।