{"_id":"5ebe90f08ebc3e906d3ce6a5","slug":"environment-has-become-favorable-for-sparrow-city-office-news-ali2336996180","type":"story","status":"publish","title_hn":"लॉकडाउन: विलुप्त होती गौरैया ने ताजा जिंदगी पाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लॉकडाउन: विलुप्त होती गौरैया ने ताजा जिंदगी पाई
विज्ञापन
गौरैया।
- फोटो : CITY OFFICE
लॉकडाउन के चलते जहां सन्नाटा और वीराना पसरा पड़ा है, वहीं गौरैया के लिए इसने शानदार मौका दिया है। लॉकडाउन के चलते प्रदूषण के घटे स्तर और साफ होती हवा ने गौरैया के अस्तित्व को बचाए रखने और इनकी संख्या बढ़ाने में अच्छा खासा योगदान दिया है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय वाइल्ड लाइफ साइंस डिपार्टमेंट के मुताबिक सर्दियों का आखिरी दौर गौरैया का प्रजनन काल होता है। और यह वही समय था जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई। यही वजह है कि लोगों के आंगन में छोटी-छोटी गौरैया फुदकती हुई नजर आ रही हैं। एएमयू वाइल्ड लाइफ साइंस डिपार्टमेंट के प्रोफेसर अफीफुल्ला कहते हैं लॉकडाउन में गौरैया की चहचहाहट निश्चित रूप से बढ़ गई है। इसका कारण प्रदूषण के स्तर में कमी, ध्वनि प्रदूषण में कमी और पर्यावरण का साफ सुथरा हो जाना है।
यह वातावरण गौरैया के साथ-साथ अन्य पक्षियों के लिए भी बहुत अनुकूल है। प्रोफेसर अफीफुल्ला कहते हैं वह जब सुबह साढे़ तीन चार बजे उठते हैं तो गौरैया की चहचहाहट सुनाई देती है, जो कि पहले नहीं थी। इसके अलावा वातावरण में बदलाव यह भी आया है कि जो सीजनल प्लांट्स मई महीने तक फूल देना बंद कर देते थे, अमलताश और गेंदे जैसे पौधे अभी भी फूल दे रहे हैं। यह लॉकडाउन का ही सकारात्मक असर है।
विज्ञापन
वरिष्ठ अधिवक्ता रामकृष्ण तिवारी कहते हैं कि उनके मकान में बहुत तंग जगह में एक पेड़ लगा हुआ है उस पर गौरैया ने अपना घोंसला बना लिया है। अचानक आए इन मेहमानों से वह बहुत प्रसन्न हैं और मकान का वह कोना गौरैया के लिए ही छोड़ दिया है।
विज्ञापन
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय वाइल्ड लाइफ साइंस डिपार्टमेंट के मुताबिक सर्दियों का आखिरी दौर गौरैया का प्रजनन काल होता है। और यह वही समय था जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई। यही वजह है कि लोगों के आंगन में छोटी-छोटी गौरैया फुदकती हुई नजर आ रही हैं। एएमयू वाइल्ड लाइफ साइंस डिपार्टमेंट के प्रोफेसर अफीफुल्ला कहते हैं लॉकडाउन में गौरैया की चहचहाहट निश्चित रूप से बढ़ गई है। इसका कारण प्रदूषण के स्तर में कमी, ध्वनि प्रदूषण में कमी और पर्यावरण का साफ सुथरा हो जाना है।
विज्ञापन
यह वातावरण गौरैया के साथ-साथ अन्य पक्षियों के लिए भी बहुत अनुकूल है। प्रोफेसर अफीफुल्ला कहते हैं वह जब सुबह साढे़ तीन चार बजे उठते हैं तो गौरैया की चहचहाहट सुनाई देती है, जो कि पहले नहीं थी। इसके अलावा वातावरण में बदलाव यह भी आया है कि जो सीजनल प्लांट्स मई महीने तक फूल देना बंद कर देते थे, अमलताश और गेंदे जैसे पौधे अभी भी फूल दे रहे हैं। यह लॉकडाउन का ही सकारात्मक असर है।
विज्ञापन
वरिष्ठ अधिवक्ता रामकृष्ण तिवारी कहते हैं कि उनके मकान में बहुत तंग जगह में एक पेड़ लगा हुआ है उस पर गौरैया ने अपना घोंसला बना लिया है। अचानक आए इन मेहमानों से वह बहुत प्रसन्न हैं और मकान का वह कोना गौरैया के लिए ही छोड़ दिया है।