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Aligarh News: एक जैसी दिखने वाली मछलियों का राज खोलेगी कान की हड्डी
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सिधरी मछली।
- फोटो : सोशल मीडिया।
इकराम वारिस
अब एक जैसी दिखने वाली मछलियों की पहचान आसान होगी। एएमयू के वैज्ञानिकों ने इसका नया तरीका खोज निकाला है। शोध में पता चला है कि मछलियों के कान के भीतर मौजूद सूक्ष्म हड्डी (ऑटोलिथ) के आकार और बनावट से उनकी प्रजाति की सटीक पहचान की जा सकती है। यह शोध मत्स्य विज्ञान, जैव विविधता संरक्षण और मत्स्य पालन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
शोधकर्ताओं ने अलीगढ़ के स्थानीय मछली बाजार से 134 मछलियों के नमूने एकत्र किए। इनमें पुंटियस चोला, पुंटियस सोफोर, पेथिया कोंचोनियस और पेथिया टिक्टो प्रजातियों को अध्ययन के लिए चुना गया। स्थानीय भाषा में इन मछलियों को सिधरी, मेलुआ के नाम से जाना जाता है। यह छोटे आकार वाली मछलियां होती हैं। शोध दल में जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. मोहम्मद अफजल खान, डॉ. लुबना यासमीन, डॉ. मोहम्मद सादिक, डॉ. इंशा हसन, एस. सलमान और ए.एम. मीर शामिल रहे।
वैज्ञानिकों ने प्रत्येक मछली के कान के अंदर मौजूद ऑटोलिथ को निकालकर आधुनिक वेवलेट विश्लेषण और मॉर्फोमेट्रिक विश्लेषण तकनीक की मदद से उसकी बनावट, आकार और माप का अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि चारों प्रजातियों के ऑटोलिथ की संरचना में स्पष्ट अंतर है। आधुनिक वेवलेट तकनीक के जरिये करीब 90 प्रतिशत मामलों में प्रजातियों की सही पहचान संभव हुई जबकि सामान्य आकार और माप के आधार पर यह सटीकता 81 प्रतिशत रही।
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शोध में यह भी सामने आया कि पेथिया कोंचोनियस और पेथिया टिक्टो आपस में अधिक समान हैं, जबकि पुंटियस चोला और पुंटियस सोफोर भी एक-दूसरे से काफी मिलती-जुलती हैं। ऐसे में केवल बाहरी बनावट के आधार पर इनकी पहचान करना कठिन होता है, लेकिन ऑटोलिथ का विश्लेषण इस चुनौती का प्रभावी समाधान साबित हुआ।
प्रो. मोहम्मद अफजल खान ने बताया कि यह अध्ययन मछलियों के वैज्ञानिक वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी) से जुड़े वर्षों पुराने भ्रम को दूर करने में मदद करेगा। साथ ही दुर्लभ और महत्वपूर्ण प्रजातियों के संरक्षण, मत्स्य संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन और मत्स्य पालन की बेहतर योजनाएं तैयार करने में भी यह शोध उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने बताया कि शोध रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक स्प्रिंगर नेचर के प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुई है।
शोध से होंगे ये बड़े फायदे :
एक जैसी दिखने वाली मछलियों की सटीक पहचान आसान होगी।
मछलियों के वैज्ञानिक वर्गीकरण से जुड़े विवाद कम होंगे।
दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में मदद मिलेगी।
मत्स्य पालन और मत्स्य संसाधन प्रबंधन की योजनाएं अधिक प्रभावी बन सकेंगी।
नदियों और जलाशयों में मछलियों की प्रजातियों का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करना आसान होगा।
मछलियों के विकास और आपसी संबंधों पर होने वाले शोध अधिक सटीक बनेंगे।
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अब एक जैसी दिखने वाली मछलियों की पहचान आसान होगी। एएमयू के वैज्ञानिकों ने इसका नया तरीका खोज निकाला है। शोध में पता चला है कि मछलियों के कान के भीतर मौजूद सूक्ष्म हड्डी (ऑटोलिथ) के आकार और बनावट से उनकी प्रजाति की सटीक पहचान की जा सकती है। यह शोध मत्स्य विज्ञान, जैव विविधता संरक्षण और मत्स्य पालन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
शोधकर्ताओं ने अलीगढ़ के स्थानीय मछली बाजार से 134 मछलियों के नमूने एकत्र किए। इनमें पुंटियस चोला, पुंटियस सोफोर, पेथिया कोंचोनियस और पेथिया टिक्टो प्रजातियों को अध्ययन के लिए चुना गया। स्थानीय भाषा में इन मछलियों को सिधरी, मेलुआ के नाम से जाना जाता है। यह छोटे आकार वाली मछलियां होती हैं। शोध दल में जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. मोहम्मद अफजल खान, डॉ. लुबना यासमीन, डॉ. मोहम्मद सादिक, डॉ. इंशा हसन, एस. सलमान और ए.एम. मीर शामिल रहे।
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वैज्ञानिकों ने प्रत्येक मछली के कान के अंदर मौजूद ऑटोलिथ को निकालकर आधुनिक वेवलेट विश्लेषण और मॉर्फोमेट्रिक विश्लेषण तकनीक की मदद से उसकी बनावट, आकार और माप का अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि चारों प्रजातियों के ऑटोलिथ की संरचना में स्पष्ट अंतर है। आधुनिक वेवलेट तकनीक के जरिये करीब 90 प्रतिशत मामलों में प्रजातियों की सही पहचान संभव हुई जबकि सामान्य आकार और माप के आधार पर यह सटीकता 81 प्रतिशत रही।
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शोध में यह भी सामने आया कि पेथिया कोंचोनियस और पेथिया टिक्टो आपस में अधिक समान हैं, जबकि पुंटियस चोला और पुंटियस सोफोर भी एक-दूसरे से काफी मिलती-जुलती हैं। ऐसे में केवल बाहरी बनावट के आधार पर इनकी पहचान करना कठिन होता है, लेकिन ऑटोलिथ का विश्लेषण इस चुनौती का प्रभावी समाधान साबित हुआ।
प्रो. मोहम्मद अफजल खान ने बताया कि यह अध्ययन मछलियों के वैज्ञानिक वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी) से जुड़े वर्षों पुराने भ्रम को दूर करने में मदद करेगा। साथ ही दुर्लभ और महत्वपूर्ण प्रजातियों के संरक्षण, मत्स्य संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन और मत्स्य पालन की बेहतर योजनाएं तैयार करने में भी यह शोध उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने बताया कि शोध रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक स्प्रिंगर नेचर के प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुई है।
शोध से होंगे ये बड़े फायदे :
एक जैसी दिखने वाली मछलियों की सटीक पहचान आसान होगी।
मछलियों के वैज्ञानिक वर्गीकरण से जुड़े विवाद कम होंगे।
दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में मदद मिलेगी।
मत्स्य पालन और मत्स्य संसाधन प्रबंधन की योजनाएं अधिक प्रभावी बन सकेंगी।
नदियों और जलाशयों में मछलियों की प्रजातियों का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करना आसान होगा।
मछलियों के विकास और आपसी संबंधों पर होने वाले शोध अधिक सटीक बनेंगे।