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एक साल की सजा का मुकदमा 9 साल में छूटा
अमर उजाला ब्यूरो/अलीगढ़
Updated Mon, 01 Feb 2016 01:40 AM IST
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पिसावा के गांव दमुआका में गांव की रंजिश में झगड़े के मुकदमे के चार आरोपियों को 9 साल बाद अदालत से बरी किया गया। खास बात यह रही कि मुकदमा मात्र एक साल की सजा का था, जिसकी पैरवी में इतना वक्त लगा कि अब आकर उन्हें अपर सत्र न्यायालय-14 के विद्वान न्यायाधीश संजयवीर सिंह के न्यायालय से बरी किया गया है।
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता के अनुसार 22 नवंबर 2007 को गांव के ही रामफुल ने वीरपाल, चंद्रबोस, सत्यपाल, कालू पर मारपीट आदि की एनसीआर दर्ज कराई। मामले में बाद में अदालत के आदेश पर पुलिस ने विवेचना दर्ज कर मारपीट की धाराओं में चार्जशीट दायर की।
इस मामले में खैर न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से आरोपियों को 20 दिसंबर 2013 को एक साल की सजा व जुर्माने से दंडित किया। इस आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में अपील की गई। जिसकी सुनवाई एडीजे-14 के न्यायालय में हुई। जहां बचाव पक्ष के अधिवक्ता आरके तिवारी ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के पक्ष में दलील रखीं।
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जिसके आधार पर 16 जनवरी को अदालत ने चारों आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि मुकदमा रंजिश में लिखाया गया। मगर आरोपों के साक्ष्य नहीं पेश किए जा सके।
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अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता के अनुसार 22 नवंबर 2007 को गांव के ही रामफुल ने वीरपाल, चंद्रबोस, सत्यपाल, कालू पर मारपीट आदि की एनसीआर दर्ज कराई। मामले में बाद में अदालत के आदेश पर पुलिस ने विवेचना दर्ज कर मारपीट की धाराओं में चार्जशीट दायर की।
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इस मामले में खैर न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से आरोपियों को 20 दिसंबर 2013 को एक साल की सजा व जुर्माने से दंडित किया। इस आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में अपील की गई। जिसकी सुनवाई एडीजे-14 के न्यायालय में हुई। जहां बचाव पक्ष के अधिवक्ता आरके तिवारी ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के पक्ष में दलील रखीं।
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जिसके आधार पर 16 जनवरी को अदालत ने चारों आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि मुकदमा रंजिश में लिखाया गया। मगर आरोपों के साक्ष्य नहीं पेश किए जा सके।