गोबर गैस: 11 हजार सिलिंडरों की क्षमता होने के बाद भी चूल्हे ठंडे, साल 2022 में हुआ बायोगैस प्लांट का लोकार्पण
योजना के तहत गांव में कई स्थानों तक पाइपलाइन बिछाई गई थी। सरकारी स्कूल में मिड-डे मील पकाने के लिए भी गैस कनेक्शन की व्यवस्था की गई थी, लेकिन पाइपलाइन में तकनीकी समस्या आने और गैस का पर्याप्त दबाव न बन पाने के कारण यह व्यवस्था शुरू ही नहीं हो सकी।
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अलीगढ़ में गभाना के गांव ओगर नगला राजू में स्थापित बायोगैस प्लांट कभी गांव को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का सपना लेकर शुरू किया गया। अगस्त 2022 में प्रधानमंत्री ने इसके लोकार्पण के बाद उम्मीद जताई कि गांव में गोबर से गैस बनेगी और पाइपलाइन के जरिये करीब 800 घरों तक रसोई गैस पहुंचाई जाएगी, लेकिन तीन साल बाद भी यह योजना जमीन पर पूरी तरह साकार नहीं हो सकी है। 170 घनमीटर क्षमता वाला यह बायोगैस प्लांट फिलहाल अपनी संभावनाओं के बावजूद अधूरा पड़ा है। गांव के किसी भी घर तक गैस नहीं पहुंच सकी है और यहां तक कि स्कूल में मिड-डे मील के लिए बिछाई गई पाइपलाइन भी उपयोग में नहीं आ पाई।
प्लांट के एस्टीमेट में कंप्रेसर नहीं था, इसलिए गैस को आगे नहीं भेज पा रहे हैं। अब कंप्रेसर लगाने और गैस आधारित जेनरेटर लगाने पर विचार किया जा रहा है।- यतेंद्र कुमार सिंह, जिला पंचायत राज अधिकारी
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पाइपलाइन बिछी, लेकिन गैस नहीं पहुंची
योजना के तहत गांव में कई स्थानों तक पाइपलाइन बिछाई गई थी। सरकारी स्कूल में मिड-डे मील पकाने के लिए भी गैस कनेक्शन की व्यवस्था की गई थी, लेकिन पाइपलाइन में तकनीकी समस्या आने और गैस का पर्याप्त दबाव न बन पाने के कारण यह व्यवस्था शुरू ही नहीं हो सकी। परिणाम यह है कि स्कूल में एक दिन भी गैस का उपयोग नहीं हो पाया। उच्च प्राथमिक विद्यालय ओगर के प्रधानाध्यापक लखपत सिंह बताते हैं कि स्कूल में मिड-डे मील के लिए पाइपलाइन लाई गई थी, लेकिन गैस का प्रेशर नहीं आया। एक दिन भी इसका उपयोग नहीं हो सका।
पाइपलाइन में नहीं आ रहा गैस का प्रेशर
प्लांट संचालक अवधेश का दावा है कि अगर इसकी पूरी क्षमता का उपयोग हो, तो हर महीने करीब 11,000 सिलेंडर भरे जा सकते हैं। यह मात्रा आसपास के कई गांवों की रसोई गैस की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन फिलहाल प्लांट पर गैस को सिलेंडरों में भरने के लिए फिलिंग मशीन और कंप्रेसर की व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण तैयार गैस का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। पंचायत सहायक शिव कुमार का कहना है कि अगर गैस फिलिंग मशीन मिल जाए तो गैस को सिलेंडरों में भरकर वितरित किया जा सकता है और इसका बेहतर उपयोग हो सकेगा।
ग्रामीण ले रहे भूसे के बदले खाद
गैस आपूर्ति भले ही शुरू नहीं हो पाई हो, लेकिन प्लांट से निकलने वाली जैविक खाद किसानों के लिए उपयोगी साबित हो रही है। ग्रामीण गोशाला में भूसा दान करते हैं और बदले में प्लांट से निकलने वाली खाद ले जाते हैं, जिसका उपयोग खेतों में किया जा रहा है। इससे किसानों को कुछ हद तक लाभ मिल रहा है, लेकिन योजना का मुख्य उद्देश्य यानी सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना अभी अधूरा है।
रोजगार और आमदनी बढ़ने का इंतजार
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) और 15वें वित्त आयोग के बजट से बने इस गोवर्धन प्रोजेक्ट का मकसद किसानों से 2 रुपये प्रति किलो गोबर खरीदकर उनकी जेब भरना और स्थानीय युवाओं को रोजगार देना था, लेकिन जब तक गैस की सप्लाई बहाल नहीं होती या फिलिंग यूनिट नहीं लगती, तब तक किसानों की आमदनी और गांव की आत्मनिर्भरता का यह मॉडल अधूरा ही रहेगा।