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अलीगढ़ ः आजादी की पहली सुबह रेलवे रोड पर निकली थी प्रभात फेरी
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15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस के नए सवेरे का खामोश गवाह रहा है रेलवे रोड स्थित जिला कांग्रेस कमेटी का कार्यालय। उस समय इस कार्यालय की प्रतिष्ठा चरम पर थी। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े और कांग्रेस के बड़े नेता अक्सर कार्यालय पर आते जाते रहते थे।
कांग्रेस कार्यालय के प्रभारी रहे 84 वर्षीय बुजुर्ग कांग्रेसी ताराचंद पांडे बताते हैं कि उन्हें अभी भी याद है कि 15 अगस्त 1947 वाले दिन रेलवे रोड की आधी पथरीली और आधी कच्ची सड़क पर मश्कों से पानी छिड़का गया था। सड़कों के दोनों तरफ चूना डाला गया था। सुबह प्रभात फेरी निकाली गई थी और कार्यालय पर मिष्ठान का वितरण किया गया था।
आर्थिक स्थिति अधिकांश लोगों की बहुत खराब थी। लेकिन सभी लोगों का उल्लास अभूतपूर्व था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। तारा चंद्र पांडे कहते हैं कि आज तो स्वतंत्रता दिवस के समारोह सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गए हैं। उनकी आत्मा कहीं खो गई है।
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स्वतंत्रता के बाद के भारत का दृश्य बयां करते हुए पर्यावरणविद सुबोध नंदन शर्मा कहते हैं कि उस समय के भारत में और आज के भारत में जमीन आसमान का अंतर है। स्वतंत्रता के बाद का समय भारत के लिए बेहद कठिन था। उस समय पूरी दुनिया के सामने हमारी स्थिति बहुत कमजोर थी।
चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, राजनीति क्षेत्र हो या खेल का क्षेत्र हो। उस समय भारत के पास केवल अपने अतीत का गौरव था। लेकिन आज भारत के पास वह सब कुछ है जो एक मजबूत देश अपने पास रखता है। हमें यहां से और आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस और प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब कहते हैं कि जिस समय देश को स्वतंत्रता मिली उस समय उनकी आयु 16 वर्ष थी। उस समय देवेश आर्थिक शोषण से गुजर रहा था। स्वतंत्रता के बाद भारत में न सिर्फ आर्थिक, बल्कि विश्व मंच पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। यह स्वतंत्रता इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व इतिहास में इतनी शांतिपूर्ण क्रांति का उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलता है।
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कांग्रेस कार्यालय के प्रभारी रहे 84 वर्षीय बुजुर्ग कांग्रेसी ताराचंद पांडे बताते हैं कि उन्हें अभी भी याद है कि 15 अगस्त 1947 वाले दिन रेलवे रोड की आधी पथरीली और आधी कच्ची सड़क पर मश्कों से पानी छिड़का गया था। सड़कों के दोनों तरफ चूना डाला गया था। सुबह प्रभात फेरी निकाली गई थी और कार्यालय पर मिष्ठान का वितरण किया गया था।
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आर्थिक स्थिति अधिकांश लोगों की बहुत खराब थी। लेकिन सभी लोगों का उल्लास अभूतपूर्व था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। तारा चंद्र पांडे कहते हैं कि आज तो स्वतंत्रता दिवस के समारोह सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गए हैं। उनकी आत्मा कहीं खो गई है।
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स्वतंत्रता के बाद के भारत का दृश्य बयां करते हुए पर्यावरणविद सुबोध नंदन शर्मा कहते हैं कि उस समय के भारत में और आज के भारत में जमीन आसमान का अंतर है। स्वतंत्रता के बाद का समय भारत के लिए बेहद कठिन था। उस समय पूरी दुनिया के सामने हमारी स्थिति बहुत कमजोर थी।
चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, राजनीति क्षेत्र हो या खेल का क्षेत्र हो। उस समय भारत के पास केवल अपने अतीत का गौरव था। लेकिन आज भारत के पास वह सब कुछ है जो एक मजबूत देश अपने पास रखता है। हमें यहां से और आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस और प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब कहते हैं कि जिस समय देश को स्वतंत्रता मिली उस समय उनकी आयु 16 वर्ष थी। उस समय देवेश आर्थिक शोषण से गुजर रहा था। स्वतंत्रता के बाद भारत में न सिर्फ आर्थिक, बल्कि विश्व मंच पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। यह स्वतंत्रता इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व इतिहास में इतनी शांतिपूर्ण क्रांति का उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलता है।