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कभी कांग्रेस तो कभी रही राम मंदिर की लहर
Aligarh
Updated Sun, 02 Mar 2014 05:30 AM IST
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अलीगढ़। आजादी के बाद से लेकर अब तक के चुनावों में मुद्दे हावी रहे हैं। कभी कांग्रेस की लहर रही तो कभी कांग्रेस विरोधी लहर। कई चुनाव ऐसे रहे, जिनमें क्षेत्रीय दलों का जातिवाद हावी रहा। इस बार के चुनाव में एक तरफ कांग्रेस के विकास और उपलब्धियां तो दूसरी ओर भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी की लहर। इसके अलावा बसपा और सपा ने भी अपने-अपने मुद्दों और उपलब्धियों के आधार पर प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतार दिया है। यहां कई बार के चुनावों में स्थानीय मुद्दे भी हावी रहे हैं। ये तो 15 मई के बाद चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि किसकी लहर और मुद्दा कामयाब रहेगा। फिलहाल जोश के साथ राजनीतिक दल चुनाव मैदान में उतर आए हैं। पिछले चुनावों के इतिहास की ओर झांके तो अब तक के चुनावों में काफी उतार चढ़ाव आए हैं। मगर खास बात यह रही है कि जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ा, उनका कोई भी राजनीतिक दल हल नहीं निकाल पाए। एक बार तो देश की बेरोजगारी भी मुद्दा बनी लेकिन कोई राहत नहीं मिली। यह लाइलाज बीमारी बनी हुई है। 15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होने के बाद पांच साल तक तो ब्रिटिश हुकूमत के ही सांसद रहे। 1952 और 1957 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस क े नेतृत्व में आजादी मिलने का फायदा कांग्रेस को मिला। इन दो चुनावों में कांग्रेस को अच्छी खासी सीटेें मिलीं। क्योंकि जनता कांग्रेस के अलावा किसी अन्य दल को ज्यादा पसंद नहीं करती थी। 1962 के चुनाव तक कांग्रेस में काफी बिखराव हुआ। नए राजनीतिक दल बने। इस चुनाव में कांग्रेस को अलीगढ़ में रिपब्लिकन पार्टी ने कड़ी चुनौती दी और इस बार कांग्रेस के प्रत्याशी रिपब्लिक पार्टी के प्रत्याशी से जाटव और मुस्लिम एक जुट के नारे से हार गए। इस बार के चुनाव में आरपीआई के बीपी मौर्य चुनाव जीते थे। 1967 के चुनाव में फिर बदलाव आया और कांग्रेस विरोधी लहर मुखर हो गई। गौ रक्षा सहित कई मुद्दे हावी हुए, इस वजह से जनसंघ समर्थित आर्य समाज के नेता पंडित शिव कुमार शास्त्री चुनाव जीत गए। 1971 के चुनाव में कांग्रेस का मुद्दा बेरोजगारी था, जो कि राष्ट्रीय स्तर पर रहा लेकिन इस मुद्दे का असर अलीगढ़ में नहीं पड़ा। क्योंकि यहां पर दंगा होकर चुका था, इस कारण मतों का ध्रुवीकरण हो गया। इस वजह से भारतीय क्रांति दल की टिकट पर फिर से पंडित शिव कुमार शास्त्री चुनाव जीत गए और राष्ट्रीय मुद्दा बेसर हो गया।
1977 के चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर और कांग्रेसी दलों की एक जुटता ने अलीगढ़ में उन दिनों इस राष्ट्रीय मुद्दे को हाबी करते हुए जनता पार्टी के ठा. नवाब सिंह चौहान को सांसद निर्वाचित कर दिया। हालांकि गैर कांग्रेसी दलों की एक जुटता सिर्फ ढाई साल ही रही। लोकसभा भंग होने पर जनता दल एस बनी, जिसक ी टिकट पर गभाना की रानी इंदिरा सिंह विजयी हुईं। यहां पर कांग्रेस की लहर बेसर रही। क्योंकि चौधरी चरण सिंह की जनता दल एस और गभाना राजा का असर, ये स्थानीय मुद्दे कारगर हुए। 1984 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति लहर अलीगढ़ में कारगर हुई। यहां से कांग्रेस की श्रीमती ऊषा रानी तोमर सांसद निर्वाचित हुईं। इसके बाद 1989 का चुनाव बोफोर्स तोप की दलाली तथा पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह को लेकर लड़ा गया। इस चुनाव में बोफोर्स तोप दलाली के मुद्दे ने जनता दल के चौधरी सतपाल सिंह को सांसद बना दिया। 1991 के लोकसभा चुनाव में राम लहर मुद्दा बनी। जिसके कारण अलीगढ़ सीट पर भाजपा की शीला गौतम चार बार के चुनाव 1991, 1996, 1998 व 1999 में निर्वाचित हुईं। 204 के चुनाव में भाजपा साइनिंग इंडिया का मुद्दा फीका पड़ गया, स्थानीय स्तर पर मुस्लिम मतों के कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण ने कांग्रेस के चौधरी बिजेंद्र सिंह को सांसद बनवा दिया। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में बसपा की सरकार। स्थानीय जातिगत आधार तथा कारणों के चलते बसपा की सीट पर राजकुमारी चौहान सांसद निर्वाचित हुईं।
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1977 के चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर और कांग्रेसी दलों की एक जुटता ने अलीगढ़ में उन दिनों इस राष्ट्रीय मुद्दे को हाबी करते हुए जनता पार्टी के ठा. नवाब सिंह चौहान को सांसद निर्वाचित कर दिया। हालांकि गैर कांग्रेसी दलों की एक जुटता सिर्फ ढाई साल ही रही। लोकसभा भंग होने पर जनता दल एस बनी, जिसक ी टिकट पर गभाना की रानी इंदिरा सिंह विजयी हुईं। यहां पर कांग्रेस की लहर बेसर रही। क्योंकि चौधरी चरण सिंह की जनता दल एस और गभाना राजा का असर, ये स्थानीय मुद्दे कारगर हुए। 1984 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति लहर अलीगढ़ में कारगर हुई। यहां से कांग्रेस की श्रीमती ऊषा रानी तोमर सांसद निर्वाचित हुईं। इसके बाद 1989 का चुनाव बोफोर्स तोप की दलाली तथा पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह को लेकर लड़ा गया। इस चुनाव में बोफोर्स तोप दलाली के मुद्दे ने जनता दल के चौधरी सतपाल सिंह को सांसद बना दिया। 1991 के लोकसभा चुनाव में राम लहर मुद्दा बनी। जिसके कारण अलीगढ़ सीट पर भाजपा की शीला गौतम चार बार के चुनाव 1991, 1996, 1998 व 1999 में निर्वाचित हुईं। 204 के चुनाव में भाजपा साइनिंग इंडिया का मुद्दा फीका पड़ गया, स्थानीय स्तर पर मुस्लिम मतों के कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण ने कांग्रेस के चौधरी बिजेंद्र सिंह को सांसद बनवा दिया। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में बसपा की सरकार। स्थानीय जातिगत आधार तथा कारणों के चलते बसपा की सीट पर राजकुमारी चौहान सांसद निर्वाचित हुईं।
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