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बीमा कंपनी को हर्जाना देना होगा
Updated Wed, 21 Feb 2018 01:48 AM IST
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क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
बीमा कंपनी ने न्यायिक अधिकारी को बीमारी की स्थिति में भर्ती होने के बाद क्लेम देने से मना कर दिया, जिसके बाद न्यायिक अधिकारी ने स्थायी लोक अदालत की शरण ली। अदालत ने बीमा कंपनी को 43 हजार रुपये इलाज के और 50 हजार रुपये हर्जाना अदा करने का आदेश दिया है।
एक न्यायिक अधिकारी ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंश कंपनी से मेडिकल बीमा कराया था जो कि 5 मार्च 2015 से 4 मार्च 2016 तक वैलिड था। इसकी क्लेम वैल्यू 5 लाख रुपये थी। 10 सितंबर 2015 को उनको दिल में दर्द उठा और बेचैनी होने लगी।
17 सितंबर की रात उन्होंने वरुण हॉस्पिटल में दिखाया वहां गुड़गांव स्थित मेदांता हास्पिटल में दिखाने के लिए परामर्श दिया गया। 18 सितंबर 2015 को मेदांता हॉस्पिटल जाने से पहले बीमा कंपनी के एजेेंट को बताया गया जिसके बाद उसने जानकारी दी कि मेदांता हॉस्पिटल बीमा कंपनी की दी गई स्वास्थ्य पालिसी में आता है।
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इलाज के बाद जब वह हॉस्पिटल से डिस्चार्ज किए गए तो बिल से संबंधित स्टाफ ने कहा कि हमारा हॉस्पिटल स्टार बीमा कंपनी के पैनल में नहीं आता है। ये बात बीमा कंपनी एजेेंट को बतायी तो उसने कहा मेल भेज रहा हूं, एप्रूवल आते ही आपको कैशलैस सुविधा मिल जाएगी। काफी समय तक मेल नहीं आया।
इसके बाद कहा गया कि पैसा जमा कर दें आपको भुगतान कर दिया जाएगा। इससे बेहद शर्मिंदगी के हालात बन गए। इसके बाद भी कंपनी की ओर से कोई भुगतान नहीं मिला।
इस पूरे मामले में स्थायी लोक अदालत की तीन सदस्यों की पीठ में शामिल पूर्व जिला जज और अध्यक्ष रियासत हुसैन, वरिष्ठ सदस्य शाजिया सिद्दीकी, डॉ. मीना बंसल ने फैसला सुनाते हुए हॉस्पिटल में हुए खर्चों के भुगतान के एवज में 43, 423 रुपये और हर्जाने के तौर पर 50 हजार रुपये देने का आदेश दिया है। एक महीने में भुगतान नहीं होने पर 9 फीसदी की ब्याज भी नियत की है।
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बीमा कंपनी ने न्यायिक अधिकारी को बीमारी की स्थिति में भर्ती होने के बाद क्लेम देने से मना कर दिया, जिसके बाद न्यायिक अधिकारी ने स्थायी लोक अदालत की शरण ली। अदालत ने बीमा कंपनी को 43 हजार रुपये इलाज के और 50 हजार रुपये हर्जाना अदा करने का आदेश दिया है।
एक न्यायिक अधिकारी ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंश कंपनी से मेडिकल बीमा कराया था जो कि 5 मार्च 2015 से 4 मार्च 2016 तक वैलिड था। इसकी क्लेम वैल्यू 5 लाख रुपये थी। 10 सितंबर 2015 को उनको दिल में दर्द उठा और बेचैनी होने लगी।
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17 सितंबर की रात उन्होंने वरुण हॉस्पिटल में दिखाया वहां गुड़गांव स्थित मेदांता हास्पिटल में दिखाने के लिए परामर्श दिया गया। 18 सितंबर 2015 को मेदांता हॉस्पिटल जाने से पहले बीमा कंपनी के एजेेंट को बताया गया जिसके बाद उसने जानकारी दी कि मेदांता हॉस्पिटल बीमा कंपनी की दी गई स्वास्थ्य पालिसी में आता है।
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इलाज के बाद जब वह हॉस्पिटल से डिस्चार्ज किए गए तो बिल से संबंधित स्टाफ ने कहा कि हमारा हॉस्पिटल स्टार बीमा कंपनी के पैनल में नहीं आता है। ये बात बीमा कंपनी एजेेंट को बतायी तो उसने कहा मेल भेज रहा हूं, एप्रूवल आते ही आपको कैशलैस सुविधा मिल जाएगी। काफी समय तक मेल नहीं आया।
इसके बाद कहा गया कि पैसा जमा कर दें आपको भुगतान कर दिया जाएगा। इससे बेहद शर्मिंदगी के हालात बन गए। इसके बाद भी कंपनी की ओर से कोई भुगतान नहीं मिला।
इस पूरे मामले में स्थायी लोक अदालत की तीन सदस्यों की पीठ में शामिल पूर्व जिला जज और अध्यक्ष रियासत हुसैन, वरिष्ठ सदस्य शाजिया सिद्दीकी, डॉ. मीना बंसल ने फैसला सुनाते हुए हॉस्पिटल में हुए खर्चों के भुगतान के एवज में 43, 423 रुपये और हर्जाने के तौर पर 50 हजार रुपये देने का आदेश दिया है। एक महीने में भुगतान नहीं होने पर 9 फीसदी की ब्याज भी नियत की है।