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अलविदा जुमा आज,तैयारियां
Updated Thu, 22 Jun 2017 11:24 PM IST
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अलविदा जुमा की नमाज आज
ब्यूरो, अमर उजाला, अलीगढ़।
जुमा अलविदा की नमाज आज जामा मस्जिद सहित सभी मस्जिदों में पढ़ी जाएगी। सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। वहीं, गुरुवार देर रात तक बाजार गुलजार रहा।
कुर्ता-पायजामा की खरीदारी शबाब पर रही। टोपियों की दुकानें भी सजीं। महिलाएं खरीदारी में जुटी रहीं। शहर के ऊपरकोट स्थित जामा मस्जिद में आसपास के मोहल्लों के लोग जुमा अलविदा की नमाज पढ़ने आते हैं।
सो, भीड़ काफी हो जाती है, इसलिए पुलिस प्रशासन को रूट डायवर्जन करना पड़ता है। मस्जिद के सामने वाली सड़कों तक नमाजी होते हैं। चारों ओर से आवाजाही नमाज मुकम्मल होने तक रोक दी जाती है। इस दौरान पुलिस फोर्स भी तैनात रहता है।
अलविदा क्यों है खास
जुमा अलविदा की नमाज की खास अहमियत है। यह अफजल जुमा होता है। रमजान के आखिरी अशरे में जुमा अलविदा की नमाज होती है। इस दिन की इबादत की अहमियत बहुत ज्यादा है।
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दुआएं भी कुबूल होती हैं। अलविदा इसलिए भी कहते हैं कि अब रमजान महीने में दूसरा जुमा नहीं पड़ेगा। रमजान में तीन अशरे दस-दस रोजे के होते हैं। पहला अशरा बरकत का, दूसरा रहमत और तीसरा अशरा मगफिरत का होता है।
आखिरी अशरे में 21, 23, 25, 27, 29वीं शब ऐसी होती हैं, जिनमें इबादत करनी होती है। इनमें ताक की रात तलाशनी होती है, जो हजारों महीने की इबादत के बराबर होती है।
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ब्यूरो, अमर उजाला, अलीगढ़।
जुमा अलविदा की नमाज आज जामा मस्जिद सहित सभी मस्जिदों में पढ़ी जाएगी। सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। वहीं, गुरुवार देर रात तक बाजार गुलजार रहा।
कुर्ता-पायजामा की खरीदारी शबाब पर रही। टोपियों की दुकानें भी सजीं। महिलाएं खरीदारी में जुटी रहीं। शहर के ऊपरकोट स्थित जामा मस्जिद में आसपास के मोहल्लों के लोग जुमा अलविदा की नमाज पढ़ने आते हैं।
सो, भीड़ काफी हो जाती है, इसलिए पुलिस प्रशासन को रूट डायवर्जन करना पड़ता है। मस्जिद के सामने वाली सड़कों तक नमाजी होते हैं। चारों ओर से आवाजाही नमाज मुकम्मल होने तक रोक दी जाती है। इस दौरान पुलिस फोर्स भी तैनात रहता है।
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अलविदा क्यों है खास
जुमा अलविदा की नमाज की खास अहमियत है। यह अफजल जुमा होता है। रमजान के आखिरी अशरे में जुमा अलविदा की नमाज होती है। इस दिन की इबादत की अहमियत बहुत ज्यादा है।
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दुआएं भी कुबूल होती हैं। अलविदा इसलिए भी कहते हैं कि अब रमजान महीने में दूसरा जुमा नहीं पड़ेगा। रमजान में तीन अशरे दस-दस रोजे के होते हैं। पहला अशरा बरकत का, दूसरा रहमत और तीसरा अशरा मगफिरत का होता है।
आखिरी अशरे में 21, 23, 25, 27, 29वीं शब ऐसी होती हैं, जिनमें इबादत करनी होती है। इनमें ताक की रात तलाशनी होती है, जो हजारों महीने की इबादत के बराबर होती है।