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UP: मुलायम का चरखा दांव आजमा रही भाजपा... फरवरी में कर दिया था बड़ा खेला; इसका तोड़ निकाल पाएंगे अखिलेश यादव?
Tue, 30 Apr 2024 02:59 PM IST
शाहरुख खान
अखिलेश कुमार, अमर उजाला, आगरा
अखिलेश कुमार, अमर उजाला, आगरा
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 30 Apr 2024 02:59 PM IST
सार
लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को मात देने के लिए भाजपा मुलायम सिंह यादव का चरखा दांव आजमा रही है। पढ़ें क्या है चरखा दांव?
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UP Lok Sabha Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इस दफा सियासी अखाड़े में दांव बदल गया है। भाजपा समाजवादी पार्टी को शिकस्त देने के लिए मुलायम सिंह का चरखा दांव लगा रही है। पार्टी को घेरने की शुरुआत भाजपा ने फरवरी में मुलायम के पहले दांव से कर दी थी। अब तोड़ निकालने में अखिलेश यादव को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है।
सियासत में मुलायम का चरखा दांव अचूक साबित रहा है। इसके बूते वह बड़े फेरबदल कर सत्ता पर काबिज होते रहे। वह नहीं रहे तो दांव बदल गया। उन्होंने पहला बड़ा दांव 1989 में चला था। मामला सूबे के सीएम का था। पार्टी नेतृत्व की पसंद अजित सिंह थे। मुलायम सिंह ने गुप्त मतदान में पार्टी के विधायकों को साध लिया। वह सीएम बन गए।
भाजपा ने सधी रणनीति से इस दांव को पहली बार राज्यसभा के चुनाव में आजमाया। दांव कामयाब रहा। सपा के सात विधायकों ने पाला बदलकर भाजपा के पक्ष में वोट डाला। इनमें मनोज पांडेय, राकेश पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी सामान्य जाति से, पूजा पाल पिछड़ा वर्ग और आशुतोष मौर्य अनुसूचित जाति से हैं।
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पिछड़ी जाति से महाराजी प्रजापति पहुंचीं ही नहीं। वह पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति की पत्नी हैं। इससे सपा को तगड़ा झटका लगा। सपा के पूर्व विधायकों, ब्लॉक प्रमुखों, जिला पंचायत सदस्यों, जिला पंचायत अध्यक्षों, निकायों के पूर्व व वर्तमान चेयरमैन को भी भाजपा तोड़ रही है। सियासी जानकारों के मुताबिक इनकी जमीनी पकड़ मजबूत होने से सपा को तगड़ा नुकसान हो सकता है।
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सियासत में मुलायम का चरखा दांव अचूक साबित रहा है। इसके बूते वह बड़े फेरबदल कर सत्ता पर काबिज होते रहे। वह नहीं रहे तो दांव बदल गया। उन्होंने पहला बड़ा दांव 1989 में चला था। मामला सूबे के सीएम का था। पार्टी नेतृत्व की पसंद अजित सिंह थे। मुलायम सिंह ने गुप्त मतदान में पार्टी के विधायकों को साध लिया। वह सीएम बन गए।
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भाजपा ने सधी रणनीति से इस दांव को पहली बार राज्यसभा के चुनाव में आजमाया। दांव कामयाब रहा। सपा के सात विधायकों ने पाला बदलकर भाजपा के पक्ष में वोट डाला। इनमें मनोज पांडेय, राकेश पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी सामान्य जाति से, पूजा पाल पिछड़ा वर्ग और आशुतोष मौर्य अनुसूचित जाति से हैं।
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पिछड़ी जाति से महाराजी प्रजापति पहुंचीं ही नहीं। वह पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति की पत्नी हैं। इससे सपा को तगड़ा झटका लगा। सपा के पूर्व विधायकों, ब्लॉक प्रमुखों, जिला पंचायत सदस्यों, जिला पंचायत अध्यक्षों, निकायों के पूर्व व वर्तमान चेयरमैन को भी भाजपा तोड़ रही है। सियासी जानकारों के मुताबिक इनकी जमीनी पकड़ मजबूत होने से सपा को तगड़ा नुकसान हो सकता है।
मुलायम ने अपने धुर विरोधियों को साधा था
मुलायम सिंह ने धुर विरोधियों को भी साथ लेने में कभी परहेज नहीं किया। कांशीराम के उभार के दौरान उन्होंने उनसे समझौता कर लिया। यह 1993 में उनके फिर से प्रदेश की सत्ता में काबिज होने का जरिया बना। 2009 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था। यह दोनों फैसले उन चरखा दांव का हिस्सा थे।
मुलायम सिंह ने धुर विरोधियों को भी साथ लेने में कभी परहेज नहीं किया। कांशीराम के उभार के दौरान उन्होंने उनसे समझौता कर लिया। यह 1993 में उनके फिर से प्रदेश की सत्ता में काबिज होने का जरिया बना। 2009 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था। यह दोनों फैसले उन चरखा दांव का हिस्सा थे।
इधर राजभर की वापसी और जयंत का साथ
भाजपा ने इसे भी आजमाया। अखिलेश के साथ रहे फिर नाराज हुए सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर को चुनाव से पहले मंत्री पद से नवाज दिया। पश्चिमी बेल्ट को मजबूत करने अखिलेश के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने वाले रालोद के जयंत को भी तोड़ लिया।
भाजपा ने इसे भी आजमाया। अखिलेश के साथ रहे फिर नाराज हुए सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर को चुनाव से पहले मंत्री पद से नवाज दिया। पश्चिमी बेल्ट को मजबूत करने अखिलेश के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने वाले रालोद के जयंत को भी तोड़ लिया।
मुलायम कड़े फैसले लेते थे, यहां भी नेतृत्व खरा-खरा
मुलायम कड़े फैसलों के पक्षधर रहे। 1999 में सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय था। तभी उनके विदेशी मूल का मुद्दा गरमाने लगा। कांग्रेस के समर्थन पत्र में सपा का नाम भी था। मुलायम ने समर्थन नहीं किया। इस बार भाजपा नेतृत्व भी फैसलों को लेकर खरा रहा। अखिलेश को घेरने के लिए मौजूदा सांसदों के टिकट पर कैंची चला दी।
मुलायम कड़े फैसलों के पक्षधर रहे। 1999 में सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय था। तभी उनके विदेशी मूल का मुद्दा गरमाने लगा। कांग्रेस के समर्थन पत्र में सपा का नाम भी था। मुलायम ने समर्थन नहीं किया। इस बार भाजपा नेतृत्व भी फैसलों को लेकर खरा रहा। अखिलेश को घेरने के लिए मौजूदा सांसदों के टिकट पर कैंची चला दी।
ये है पहलवानी का चरखा दांव
चरखा दांव में पहलवान विपक्षी की गर्दन और पैरों को एक ही वक्त में काबू कर लेता है। एक हाथ से गर्दन को उल्टा दबाया जाता है, तो दूसरे से पैर गर्दन की ओर खींचे जाते हैं। इससे विपक्षी सूत कातने वाले चरखे के पहिए की तरह गोल हो जाता है। इसी मुद्रा में उसे लॉक कर दिया जाता है।
चरखा दांव में पहलवान विपक्षी की गर्दन और पैरों को एक ही वक्त में काबू कर लेता है। एक हाथ से गर्दन को उल्टा दबाया जाता है, तो दूसरे से पैर गर्दन की ओर खींचे जाते हैं। इससे विपक्षी सूत कातने वाले चरखे के पहिए की तरह गोल हो जाता है। इसी मुद्रा में उसे लॉक कर दिया जाता है।