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मेले ने लौटाई सिल-बटना, चाकी, कारीगरों के चेहरे खिले
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बटेश्वर मेले में खरीददारों की भीड से खुश हुये दुकानदार, यमुना के घाट पर भी रही भीड
- फोटो : Agra Dehat
बाह। बटेश्वर मेले में प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान से आने वाले पत्थर कारीगरों ने दुकानें सजाई हैं। पत्थर की चाकी, सिल-बटना आदि की बिक्री भी खूब हुई। इससे ये गदगद हैं। बताया कि कोरोना कॉल के बाद इस मेले ने उनकी जेब भर दी।
पत्थर के सामान बनाने और बेचने वाले फिरोजाबाद के किशनपुर की काजल , धौलपुर के दंपती नेहा व पिंटू, शिकोहाबाद की गीता, इटावा के दिबियापुर के राम बहादुर आदि ने दुकानें लगाई हैं। मंगलवार को पत्थरों को छेनी और हथौड़ी से चाकी , सिल-बटना का आकार देते और बिक्री करते दिखे।
इटावा के राम बहादुर ने बताया कि चाकी, सिल-बटना बनाना और बेचने से ही उनका परिवार चलता है। मेले में 10 दिनों से रोजाना तीन से चार हजार की कमाई हो रही है। धौलपुर की नेहा ने बताया कि मेले में करीब 40 हजार की कमाई हुई है।
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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा पत्थर कारीगरों की देहरी पर दम तोड़ता दिखता है। भिंड के मेहगांव से मां सीता के साथ आई काजल ने बताया कि पत्थरों को तराशने में मां का हाथ मेला दर मेला बटाने में ही बचपन बीत गया। धौलपुर से अपनी मां ममता के साथ पहुंची नेहा भी सिल को आकार दे रही थी। पढ़ाई के बारे में पूछा तो बोली कि उनके परिवार के लिए पढ़ाई के कोई मायने नहीं हैं।
कारीगरों ने बताया कि मशीनों ने उनका काम छीन लिया है। एक चक्की बनाने में चार दिन लग जाते है और बिकती है 500-700 रुपये की है। एक दिन में तीन सिल बना लेते है और कीमत मिलती है 200-400 रुपये। पत्थर शिल्पियों ने बताया कि बटेश्वर, अंबाह, धौलपुर, बालाजी, इटावा, औरेया, लहार, ग्वालियर, पिनाहट, जयपुर के मेले करने में ही साल बीत जाता है।
बाह। बटेश्वर मेले में बुधवार को अखिल भारतीय कुश्ती दंगल का आयोजन किया गया है। जिसमें भारत केसरी पहलवान अपना दमखम दिखाएंगे। कुश्ती दंगल के साथ ही जिला पंचायत मेले का समापन करेगी।
बटेश्वर में जिला पंचायत के मंच पर दिन में रासलीला और रात में रामलीला का अयोजन हुआ। इस दौरान सुरेश ब्रजवासी की टीम की प्रस्तुति ने लोगों खूब लुभाया। राधा-कृष्ण का रास देखकर दर्शक मंत्र मुग्ध हो उठे।
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पत्थर के सामान बनाने और बेचने वाले फिरोजाबाद के किशनपुर की काजल , धौलपुर के दंपती नेहा व पिंटू, शिकोहाबाद की गीता, इटावा के दिबियापुर के राम बहादुर आदि ने दुकानें लगाई हैं। मंगलवार को पत्थरों को छेनी और हथौड़ी से चाकी , सिल-बटना का आकार देते और बिक्री करते दिखे।
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इटावा के राम बहादुर ने बताया कि चाकी, सिल-बटना बनाना और बेचने से ही उनका परिवार चलता है। मेले में 10 दिनों से रोजाना तीन से चार हजार की कमाई हो रही है। धौलपुर की नेहा ने बताया कि मेले में करीब 40 हजार की कमाई हुई है।
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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा पत्थर कारीगरों की देहरी पर दम तोड़ता दिखता है। भिंड के मेहगांव से मां सीता के साथ आई काजल ने बताया कि पत्थरों को तराशने में मां का हाथ मेला दर मेला बटाने में ही बचपन बीत गया। धौलपुर से अपनी मां ममता के साथ पहुंची नेहा भी सिल को आकार दे रही थी। पढ़ाई के बारे में पूछा तो बोली कि उनके परिवार के लिए पढ़ाई के कोई मायने नहीं हैं।
कारीगरों ने बताया कि मशीनों ने उनका काम छीन लिया है। एक चक्की बनाने में चार दिन लग जाते है और बिकती है 500-700 रुपये की है। एक दिन में तीन सिल बना लेते है और कीमत मिलती है 200-400 रुपये। पत्थर शिल्पियों ने बताया कि बटेश्वर, अंबाह, धौलपुर, बालाजी, इटावा, औरेया, लहार, ग्वालियर, पिनाहट, जयपुर के मेले करने में ही साल बीत जाता है।
बाह। बटेश्वर मेले में बुधवार को अखिल भारतीय कुश्ती दंगल का आयोजन किया गया है। जिसमें भारत केसरी पहलवान अपना दमखम दिखाएंगे। कुश्ती दंगल के साथ ही जिला पंचायत मेले का समापन करेगी।
बटेश्वर में जिला पंचायत के मंच पर दिन में रासलीला और रात में रामलीला का अयोजन हुआ। इस दौरान सुरेश ब्रजवासी की टीम की प्रस्तुति ने लोगों खूब लुभाया। राधा-कृष्ण का रास देखकर दर्शक मंत्र मुग्ध हो उठे।