{"_id":"68f162d52c00aff6ed035c08","slug":"the-condition-of-the-hanging-house-in-agra-is-dilapidated-agra-news-c-25-1-agr1034-894454-2025-10-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"Agra News: बंद पड़ा आगरा का वर्षों पुराना फांसी घर, जल्लाद की भी तैनाती नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Agra News: बंद पड़ा आगरा का वर्षों पुराना फांसी घर, जल्लाद की भी तैनाती नहीं
विज्ञापन
आगरा। दुष्कर्म और हत्या के दोषियों को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है। दोनों कैदियों को फिलहाल जिला जेल में रखा गया है। जिला जेल की बात करें तो यहां पर पूर्व में 35 कैदियों को फांसी दी जा चुकी हैं। वर्ष 1991 में आखिरी बार जुम्मन को फांसी दी गई थी। उसे भी बच्ची की हत्या के केस में दोषी पाया गया था। वह बुलंदशहर का रहने वाला था। वर्तमान में जेल का फांसी घर जर्जर है। यहां जल्लाद की भी तैनाती नहीं है।
मुगलों की राजधानी रहा आगरा ताजमहल, किला और बुलंद दरवाजा ही नहीं, जिला कारागार के लिए भी जाना जाता है। 12वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह गाजी के शासनकाल में हज आने-जाने वाले यात्रियों के आराम करने के लिए 1741 ई. में इसका निर्माण कराया गया था। आजादी मिलने पर इसे जिला कारागार बना दिया गया। जिला कारागार में ही फांसी घर भी बनाया गया था। इसमें कई बंदियों को फांसी दी गई थी।
सबसे पहली फांसी 1951 में दी गई थी। 34 साल पहले जुम्मन को आखिरी बार फांसी दी गई थी। फांसी की सजा मिलने पर ज्यादातर बंदियों को केंद्रीय कारागार में रखा जाता है मगर, केंद्रीय कारागार में फांसी घर नहीं है। जिला जेल की बात करें तो यहां का फांसी घर जर्जर हालत में है। इसमें न कोई कमरा है और न ही दीवारें बनी हैं। सिर्फ फंदा बनाने के लिए लगाए गए ऐंगल ही बचे हैं। जेल के मुख्य गेट से करीब 600 मीटर की दूरी पर होने के कारण आसपास कोई जाता भी नहीं है। चारों तरफ झाड़ियां उग आई हैं।
विज्ञापन
जेल अधीक्षक हरिओम शर्मा ने बताया कि फांसी की सजा मिलने के बाद दोषी उच्च अदालत में अपील करते हैं। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है। हाल में किसी को फांसी नहीं दी गई है। फांसी घर की जर्जर हालत के बारे में पूर्व में उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। इसके पुन: निर्माण पर विचार विमर्श किया जाएगा।
-- -- -- -- -- --
बंदी पर रखी जाती है नजर
जेल अधीक्षक ने बताया कि सजा मिलने के बाद अधिकतर बंदी तनावग्रस्त हो जाते हैं। इस कारण उन पर नजर रखी जाती है। सभी को सामान्य बैरक में रखा जाता है। साथी बंदी उनसे बात करते रहते हैं। इसके अलावा जेल के कर्मचारियों को भी लगाया जाता है।
विज्ञापन
मुगलों की राजधानी रहा आगरा ताजमहल, किला और बुलंद दरवाजा ही नहीं, जिला कारागार के लिए भी जाना जाता है। 12वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह गाजी के शासनकाल में हज आने-जाने वाले यात्रियों के आराम करने के लिए 1741 ई. में इसका निर्माण कराया गया था। आजादी मिलने पर इसे जिला कारागार बना दिया गया। जिला कारागार में ही फांसी घर भी बनाया गया था। इसमें कई बंदियों को फांसी दी गई थी।
विज्ञापन
सबसे पहली फांसी 1951 में दी गई थी। 34 साल पहले जुम्मन को आखिरी बार फांसी दी गई थी। फांसी की सजा मिलने पर ज्यादातर बंदियों को केंद्रीय कारागार में रखा जाता है मगर, केंद्रीय कारागार में फांसी घर नहीं है। जिला जेल की बात करें तो यहां का फांसी घर जर्जर हालत में है। इसमें न कोई कमरा है और न ही दीवारें बनी हैं। सिर्फ फंदा बनाने के लिए लगाए गए ऐंगल ही बचे हैं। जेल के मुख्य गेट से करीब 600 मीटर की दूरी पर होने के कारण आसपास कोई जाता भी नहीं है। चारों तरफ झाड़ियां उग आई हैं।
विज्ञापन
जेल अधीक्षक हरिओम शर्मा ने बताया कि फांसी की सजा मिलने के बाद दोषी उच्च अदालत में अपील करते हैं। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है। हाल में किसी को फांसी नहीं दी गई है। फांसी घर की जर्जर हालत के बारे में पूर्व में उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। इसके पुन: निर्माण पर विचार विमर्श किया जाएगा।
बंदी पर रखी जाती है नजर
जेल अधीक्षक ने बताया कि सजा मिलने के बाद अधिकतर बंदी तनावग्रस्त हो जाते हैं। इस कारण उन पर नजर रखी जाती है। सभी को सामान्य बैरक में रखा जाता है। साथी बंदी उनसे बात करते रहते हैं। इसके अलावा जेल के कर्मचारियों को भी लगाया जाता है।