श्री पारस अस्पताल: उच्च स्तरीय जांच में फंस सकती है डेथ ऑडिट कमेटी, सिर्फ 16 मरीजों की मौत की जांच
विगत 26 अप्रैल की सुबह मॉकड्रिल में कथित 22 मरीजों की मौत के आरोप लगे। जिनमें 10 लोगों ने मृतकों का ब्योरा प्रशासन को सौंपा था। छह अन्य मरीजों सहित कुल 16 मरीजों का डेथ ऑडिट कराया गया।
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श्री पारस अस्पताल में 96 मरीज थे। आईएमए ने 91 मरीज बताए हैं। मॉकड्रिल से 22 मरीज छांटे गए। जिनमें 16 मृतकों का ही डेथ ऑडिट एसएन मेडिकल कॉलेज की जांच कमेटी से कराया गया। चिकित्सा मामलों के विधि विशेषज्ञ डॉ. देवेन्द्र गुप्ता का कहना है कि डेथ ऑडिट में सभी मरीजों को शामिल करना चाहिए था। अगर मामला हाईकोर्ट गया तो कमेटी पर जवाब देते नहीं बनेगा। विगत 26 अप्रैल की सुबह मॉकड्रिल में कथित 22 मरीजों की मौत के आरोप लगे। जिनमें 10 लोगों ने मृतकों का ब्योरा प्रशासन को सौंपा था। छह अन्य मरीजों सहित कुल 16 मरीजों का डेथ ऑडिट कराया गया।
शेष छह गंभीर मरीजों का ऑडिट ही नहीं हुआ। इसी तरह 96 भर्ती मरीजों की बीएचटी (बेड हैड टिकट) नहीं जांची गई। बीएचटी से साफ हो जाता कि कितने मरीजों को कितनी ऑक्सीजन दी गई। हाईफ्लो ऑक्सीजन पर निर्भर सभी मरीजों का ब्योरा भी जांच में सार्वजनिक नहीं किया। ऐसे में प्रशासन व एसएन की जांच कमेटियों पर सवाल उठ रहे हैं। पीड़ितों का आरोप है कि 10 शिकायतें नहीं होती तो 16 मौतें भी नहीं बताई जातीं। मृतकों की वास्तविक संख्या में हेरफेर के आरोप हैं।
हाईफ्लो में एक मरीज पर चार सिलिंडर की खपत
जिन मरीजों को हाईफ्लो ऑक्सीजन पर रखा जाता है उनके लिए 24 घंटे में चार से छह सिलिंडर की खपत होती है। 10 से 12 लीटर प्रति मिनट हाईफ्लो होता है। ऐसे में एक सिलिंडर अधिकतम एक मरीज पर तीन घंटे चलता है। 22 मरीज हाईफ्लो पर थे। ऐसे में उनके लिए अधिक ऑक्सीजन की जरूरत थी। उस दिन ऑक्सीजन की कमी होने पर कथित मॉकड्रिल की गई।
विशेषज्ञ का कहना है, सात साल तक बीएचटी सुरक्षित रखना जरूरी
सात साल तक मरीज की बीएचटी सुरक्षित रखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक बीएचटी को जांच के लिए कोर्ट में तलब किया जा सकता है। डेथ ऑडिट में सभी मरीजों को शामिल करना चाहिए था। ऐसे में अगर कोई डेथ ऑडिट को कोर्ट में चैलेंज करता है तो कमेटी पर जवाब देते नहीं बनेगा। कमेटी निष्पक्ष व स्वतंत्र होनी चाहिए थी जबकि यहां एसएन चिकित्सकों ने ऑडिट किया। आरोपित संचालक भी एसएन का छात्र रहा है। -डॉ. देवेन्द्र गुप्ता, चिकित्सा मामलों के विधि विशेषज्ञ
स्वतंत्र एजेंसी ने की जांच
डेथ ऑडिट कमेटी स्वतंत्र एजेंसी है। जांच में दो विभागाध्यक्ष शामिल थे। सभी मानकों का ध्यान रखा गया है। अगर कोई कमी होगी तो कमेटी उसका जवाब देगी। ऑडिट में 16 मृतकों का ब्योरा सार्वजनिक किया है। -प्रभु एन सिंह, जिलाधिकारी
ऑक्सीजन नहीं थी.. मेरे पति को अस्पताल से निकाला
कमला नगर निवासी पायल डाबर ने 26 अप्रैल को ऑक्सीजन संकट पर प्रशासन के दावे पर सवाल खड़े किए हैं। शनिवार को उन्होंने कहा कि 26 अप्रैल को पूरे शहर में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मच रहा था। मेरे पति ट्रांस यमुना स्थित एक अस्पताल में भर्ती थे। ऑक्सीजन खत्म होने पर उन्हें अस्पताल से निकाल दिया गया। मेरा बेटा दिनभर ऑक्सीजन के लिए भटका लेकिन कहीं सिलिंडर नहीं मिला। मैं पति को घर ले आई। घर पर ही इलाज कराया। उन्होंने कहा कि प्रशासन का यह कहना है कि ऑक्सीजन की कमी नहीं थी। सफेद झूठ है।
निजी कोविड सेंटर रामरघु में सेवानिवृत्त सीओ रामभजन शर्मा की मौत के मामले में शुक्रवार को हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी समेत सभी पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। 17 अगस्त को इस मामले में दोबारा सुनवाई होगी। पीड़ित पुनीत पाराशर ने बताया कि 15 अगस्त, 2020 को मैंने अपने दादा जी को भर्ती किया था।
अस्पताल से एंबुलेंस तक ले जाने के लिए ऑक्सीजन नहीं मिली। तीन-चार सिलिंडर स्टाफ लेकर आया। सभी खाली निकले। घर पहुंचने से पहले ही रास्ते में मरीज की मौत हो गई। मामले में ऑक्सीजन की कमी व लापरवाही को लेकर पुनीत ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।
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