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रामलला प्राण प्रतिष्ठा : वृंदावन का वह मंदिर जहां भगवान कृष्ण ने धारण किया था श्रीराम का रूप, जानें इतिहास

Mon, 22 Jan 2024 12:57 PM IST
धीरेन्द्र सिंह संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Mon, 22 Jan 2024 12:57 PM IST
सार

Ramlala Pran Pratishtha: अयोध्या में हो रही प्राण प्रतिष्ठा को लेकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान और ठा. द्वारिकाधीश मंदिर सहित अन्य कई मंदिरों में कान्हा जी सोमवार को प्रभु श्रीराम के रूप में दर्शन देंगे। इस मौके पर आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां तुलसीदास के लिए भगवान कृष्ण ने भगवान श्रीराम का रूप धारण किया था। 
 

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Lord Krishna became Shri Ram in Tulsi Ramdarshan place Vrindavan mathura
राधा-कृष्ण और भगवान श्रीराम के श्रीविग्रह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ब्रज का कण-कण भगवान श्रीकृष्ण की लीला का साक्षी है। ऐसी ही एक लीला का साक्षी है वृंदावन का तुलसी राम दर्शन स्थल। मान्यता है कि यहां श्रीकृष्ण ने भगवान राम का रूप धारण कर महाकवि तुलसीदास को दर्शन दिए थे। तभी से इस श्रीकृष्ण मंदिर का नाम तुलसीराम दर्शन स्थल हो गया। यहां भगवान अयोध्यापति रामस्वरूप में धनुष बाण धारी होकर विराजित हैं।
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उप्र सरकार द्वारा प्रकाशित कराई पुस्तक ब्रज लोक संपदा पुस्तक में वृंदावन शोध संस्थान के समन्वयक उमेश चंद शर्मा ने ज्ञान गुदड़ी मंदिर पर लेख लिखा था। उमेश चंद बताते हैं कि तुलसीदास के समकालीन अविनाश ब्रह्म भट्ट ने गोस्वामीजी के चरित्र को तुलसी प्रकाश पोथी के अंतर्गत कलमबद्ध किया था। इससे ज्ञात होता है कि गोस्वामीजी विक्रम संवत 1628 में माघ शुक्ल पंचमी तिथि मंगलवार को ब्रज में आए थे। वृंदावन के ज्ञान गुदड़ी स्थित तुलसीराम दर्शन स्थल पर वह ब्रज की यात्रा करते हुए आए थे। यहां सर्वत्र राधे-राधे की रट सुनकर तुलसीदास लगा कि शायद यहां के लोगों में भगवान राम के प्रति उतनी भक्ति नहीं है। इस पर तुलसीदास के मुख से दोहा निकला ‘राधा-राधा रटत हैं, आम ढाक अरु कैर। तुलसी या ब्रजभूमि में कहा राम सौं बैर। का वरनऊ छवि आज की भले बने हो नाथ, तुसली मस्तक तब नबे धनुष बाण लियो हाथ।
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इसके बाद वह ज्ञानगुदड़ी स्थित श्रीकृष्ण मंदिर पहुंचे और भगवान कृष्ण के श्रीविग्रह के सम्मुख नतमस्तक हुए। यहां उस समय के पुजारी परशुराम ने तुलीसदास को देख कहा कि आप तो श्रीराम के उपासक, भगवान श्रीकृष्ण को क्यों प्रणाम कर रहे हो। आप तो श्रीराम को ही प्रणाम करो। परशुराम के वचन सुनकर तुलसीदास जी का मन व्याकुल हो उठा। तभी तुलसीदास ने कहा कि हे प्रभु श्रीराम आप ब्रज में आकर क्या बन गए हो। आपकी छवि से गोपियां, मुरली, चंद्रिका मेल नहीं खाती। मेरा मस्तिष्क अब तभी छुकेगा, जब आप राम मुरली छोड़कर धनुष-वाण धारण करोगे। मान्यता है कि तुलसीदास की प्रार्थना सुनकर भगवान कृष्ण अपने भक्त की लाज रखने के लिए प्रेमपूर्वक श्रीकृष्ण से राम बन गए। तब तुलसीदास ने उनको प्रणाम कर अपना मस्तिष्क छुकाया। ब्रज के साहित्य में इस वाकये का कई पुस्तकों में उल्लेख है।
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श्रीकृष्ण का मंदिर बना तुलसीदास दर्शन स्थल
कहा जाता है कि जब तुलसीदास यहां आए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण का ही मंदिर था। श्रीकृष्ण ने भगवान श्रीराम के रूप में तुलसीदास को दर्शन दिए, तब यह स्थल तुलसी रामदर्शन स्थल के नाम से जाना जाने लगा। यहां भगवान कृष्ण, राधारानी के साथ विराजमान हैं तो उनके पीछे धनुष बाण लिए भगवान राम भी विराजमान हैं। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने भक्त की इच्छा के अनुरूप धनुष-बाण धारण कर भगवान श्रीराम के रूप में दर्शन दिए थे। तुलसीदास की भक्ति पर प्रभु के धनुष बाण हाथ में लेने का उल्लेख गोवर्धन यात्रा के दौरान भी मिलता है। तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस के लेखन का आरंभ विक्रम संवत 1631 में किया था। इससे तीन वर्ष पहले वे ब्रज यात्रा कर चुके थे। इसका प्रमाण उनके द्वारा रचित कृष्णपदावली में है।
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कम ही पहुंचते हैं भक्त
तुलसीराम दर्शन स्थल में दायीं तरफ एक पत्थरों की बनी कुटिया है। इसके बारे कहा जाता है कि यहीं तुलसीदास ने साधना की थी। वृंदावन प्रतिदिन हजारों लोग आते हैं, लेकिन तुलसीराम दर्शन स्थल का प्रसार-प्रचार न होने के कारण बहुत कम दर्शनार्थी ही यहां पहुंच पाते हैं।
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