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महिला दिवस: शीला बुआ के बुलंद इरादों ने विपरीत परिस्थितियों को हराया, इस उम्र में साइकिल से पहुंचाती हैं दूध
Mon, 08 Mar 2021 05:47 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कासगंज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कासगंज
Published by: Abhishek Saxena
Updated Mon, 08 Mar 2021 05:47 AM IST
सार
- 62 की उम्र में साइकिल से घर-घर पहुंचाती हैं दूध
- दो भैंस खरीदकर किया था काम शुरू
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महिला दिवस: साइकिल से बिक्री के लिए दूध ले जातीं शीला बुआ
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कासगंज में शीला बुआ एक ऐसा नाम है जो बुलंद इरादों का पर्याय नजर आता है। परिवार की विपरीत परिस्थितियों को मात देकर आत्मनिर्भर बन उन्होंने मिसाल कायम की। खेड़ा निवासी शीला 62 वर्ष की उम्र में साइकिल से घर-घर लोगों को दूध पहुंचाती हैं।
सहावर तहसील क्षेत्र के खेड़ा गांव की निवासी 62 वर्षीय महिला शीला देवी ने अपने जीवन में काफी परेशानियों का सामना किया। वर्ष 1980 में जब वह महज 21 साल की थीं तो उनके पति का निधन हो गया। पति के निधन से टूटी शीला बुआ कुछ समय के बाद अपने पिता के घर आ गईं। वह माता-पिता के साथ रहने लगीं और उनका सहयोग खेती, किसानी और पशुपालन में करने लगीं।
हिम्मत नहीं हारी
माता-पिता की जमीन भी ज्यादा नहीं थी। मात्र चार बीघा जमीन ही थी। जिससे परिवार का गुजारा भी मुश्किल था, लेकिन एक वर्ष में ही उनके माता-पिता का भी निधन हो गया। पहले पति, फिर माता-पिता की मौत, लगातार उनकी जिंदगी में ऐसी परिस्थितियां सामने आईं लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
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सहावर तहसील क्षेत्र के खेड़ा गांव की निवासी 62 वर्षीय महिला शीला देवी ने अपने जीवन में काफी परेशानियों का सामना किया। वर्ष 1980 में जब वह महज 21 साल की थीं तो उनके पति का निधन हो गया। पति के निधन से टूटी शीला बुआ कुछ समय के बाद अपने पिता के घर आ गईं। वह माता-पिता के साथ रहने लगीं और उनका सहयोग खेती, किसानी और पशुपालन में करने लगीं।
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हिम्मत नहीं हारी
माता-पिता की जमीन भी ज्यादा नहीं थी। मात्र चार बीघा जमीन ही थी। जिससे परिवार का गुजारा भी मुश्किल था, लेकिन एक वर्ष में ही उनके माता-पिता का भी निधन हो गया। पहले पति, फिर माता-पिता की मौत, लगातार उनकी जिंदगी में ऐसी परिस्थितियां सामने आईं लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
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महिला दिवस: 62 की उम्र में साइकिल से घर-घर दूध पहुंचातीं शीला बुआ
- फोटो : अमर उजाला
दो भैंस खरीदकर किया था काम शुरू
शीला बुआ ने परिस्थितियों को मात देने के लिए पशुपालन के लिए दो भैंस खरीदीं। पशुओं की देखभाल के साथ ही अपना जीवन व्यतीत करने की ठान ली। भैंसों के दूध से उन्होंने काम शुरू किया। शीला बुआ ने दूध गांव में बेचने के बजाए समीप के कस्बों में बेचने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने साइकिल से दूध का वितरण शुरू कर दिया। इस मेहनत के साथ उन्हें कुछ अतिरिक्त मुनाफा भी होने लगा। इसके बाद उन्होंने गांव के अन्य पशुपालकों से दूध खरीदकर कस्बे में बेचने का सिलसिला शुरू किया। जिससे उनकी अधिक आमदनी होने लगी। उन्होंने अपने जीवन को संवारना शुरू कर दिया।
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उम्र की सीमाओं को छोड़ा पीछे
62 वर्ष की उम्र में भी वह रोज सुबह चार बजे उठकर पशुओं का काम निपटाती हैं और दूध एकत्रित करके साइकिल से दूध बेचने के लिए निकल जाती हैं। उनका आत्मनिर्भर होने का मन लोगों की जुबां पर रहता है। अब वह अपने पक्के घर में रहती हैं। पशुओं की देखभाल करती हैं और खेती का कार्य भी। उनका कहना है कि हर व्यक्ति को मजबूत इरादे के साथ काम करना चाहिए तो सफलता अवश्य मिलेगी। काम में ईमानदारी और लग्न भी जरूरी है।
शीला बुआ ने परिस्थितियों को मात देने के लिए पशुपालन के लिए दो भैंस खरीदीं। पशुओं की देखभाल के साथ ही अपना जीवन व्यतीत करने की ठान ली। भैंसों के दूध से उन्होंने काम शुरू किया। शीला बुआ ने दूध गांव में बेचने के बजाए समीप के कस्बों में बेचने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने साइकिल से दूध का वितरण शुरू कर दिया। इस मेहनत के साथ उन्हें कुछ अतिरिक्त मुनाफा भी होने लगा। इसके बाद उन्होंने गांव के अन्य पशुपालकों से दूध खरीदकर कस्बे में बेचने का सिलसिला शुरू किया। जिससे उनकी अधिक आमदनी होने लगी। उन्होंने अपने जीवन को संवारना शुरू कर दिया।
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उम्र की सीमाओं को छोड़ा पीछे
62 वर्ष की उम्र में भी वह रोज सुबह चार बजे उठकर पशुओं का काम निपटाती हैं और दूध एकत्रित करके साइकिल से दूध बेचने के लिए निकल जाती हैं। उनका आत्मनिर्भर होने का मन लोगों की जुबां पर रहता है। अब वह अपने पक्के घर में रहती हैं। पशुओं की देखभाल करती हैं और खेती का कार्य भी। उनका कहना है कि हर व्यक्ति को मजबूत इरादे के साथ काम करना चाहिए तो सफलता अवश्य मिलेगी। काम में ईमानदारी और लग्न भी जरूरी है।