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Health News: कान की बीमारियों से कम हो रहा बौद्धिक स्तर, याददाश्त भी हो रही कमजोर; ये कहते हैं चिकित्सक

Sun, 10 Nov 2024 02:15 PM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला, आगरा
अमर उजाला, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Sun, 10 Nov 2024 02:15 PM IST
सार

आगरा में आयोजित ईएनटी वर्कशॉप में विशेषज्ञों ने व्याख्यान दिए। बताया सुनाई कम देने से समझने की शक्ति भी विकसित नहीं हो पाती है। इस वजह से बच्चे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
 

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Intellectual level decreasing due to ear diseases memory is also becoming weak know doctors say
डॉ. पवन सिंघल - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

कान की बीमारियों से बच्चों का बौद्धिक स्तर प्रभावित हो रहा है। इससे याद करने और समझने की क्षमता भी कमजोर पड़ रही है। फतेहाबाद रोड स्थित होटल में इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑटोलॉजी की कार्यशाला के दूसरे दिन विशेषज्ञों ने ईएनटी की बढ़ती बीमारियों से पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में बताया। जिन मरीजों को मंदबुद्धि और कम बौद्धिक स्तर वाला बताया, उनकी जांच में 40 फीसदी में कान की बीमारी मिली।
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जयपुर के सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज के ईएनटी रोग विशेषज्ञ डॉ. पवन सिंघल ने बताया कि 1000 शिशुओं में से 3-6 बच्चों में कान की बीमारी के कारण उसकी बौद्धिक स्तर कम मिल रहा है। याददाश्त, सीखने-समझने और बोलने की क्षमता भी कमजोर है। जांच की तो इनमें कम सुनने, कान की बीमारी के चलते ये परेशानी बनी। परिजन इसे मंदबुद्धि, कम बौद्धिक स्तर का भी समझने लगे। ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन है कि पैदा होने के एक महीने पर शिशु के कान की जांच की जाए, उसमें दिक्कत होने पर तीन महीने पर जांच कराएं। इसमें परेशानी मिलने पर 6 महीने की आयु में फिर जांच कराएं और सुनने की मशीन लगाएं। एक साल का शिशु होने पर कॉकलियर इम्प्लांट कराएं। कार्यशाला में डॉ. सतीश जैन, डॉ. गौरव खंडेलवाल, डॉ. आलोक मित्तल, डॉ. राजीव पचौरी, डॉ. धर्मेंद्र गुप्ता, डॉ. रीतु गुप्ता, डॉ. मनीष सिंघल, डाॅ. संजय खन्ना, डॉ. सलोनी सिंह बघेल आदि मौजूद रहे।
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कान में संक्रमण से गड़बड़ा रहा शरीर का संतुलन
कोलकाता के डॉ. अनिर्बान विश्वास ने कहा कि चलते हुए लड़खड़ाना, चक्कर आने की परेशानी है तो ये न्यूरोलॉजी डिसआर्डर, हृदय, मधुमेह के अलावा कान की बीमारियां वजह हैं। शरीर के संतुलन को नियंत्रित करने और सुनने की नस नजदीक होती हैं। इससे संतुलन गड़बड़ा जाता है। 50 फीसदी में कान की दिक्कत मिल रही है।
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वायरल संक्रमण, जुकाम-खांसी से अस्थायी बहरापन
जयपुर के डॉ. ऋषभ जैन ने बताया कि बार-बार जुकाम-खांसी और वायरल संक्रमण से अचानक सुनने की क्षमता कम होने की बीमारी बढ़ रही है। कान की नस में रक्त संचार प्रभावित होने से संक्रमण भी हो जाता है। कान के भारीपन, सीटी की आवाज आने की भी परेशानी होने लगती है।


मूक लोगों की आवाज बनेगा टाॅकिंग्स ग्लव्स
एम्स जोधपुर के डॉ. अमित गोयल ने बताया कि टॉकिंग ग्लव्स डिवाइस बनाई है, जिसका पेटेंट करा लिया है। इसे पहनकर कंप्यूटर पर अंगुलियां चलाकर अपनी बात को सामने वाले तक पहुंचा सकते हैं। इससे किसी भी भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं। मूक मरीजों के लिए ये कारगर साबित होगा।
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