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ब्रज में फाग: लठामार होली के एक दिन बाद खेली जाती थी सांखी की होली, बदलते दौर में फीके पड़े रंग
Mon, 08 Mar 2021 12:08 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Mon, 08 Mar 2021 12:08 AM IST
सार
- महिलाओं और पुरुषों की टोलियों में काव्य के माध्यम से होती थी होली
- सांखी की टोलियों की कई-कई दिन पहले ही हो जाती थी बुकिंग
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बरसाना की लठामार होली (फाइल)
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
ब्रज की होली के रंग अनेक हैं। इनमें से एक है नंदगांव की प्रसिद्ध सांखी की होली। एक समय था जब सांखी गाने और नाचने वाली टोलियां कई-कई दिन पहले बुक हो जाती थीं। करीब तीन दशक पूर्व तक कस्बे में सांखी की होली नंदगांव की लठामार होली के एक दिन बाद और धूल होली पर कृष्ण कुंड के समीप खेली जाती थी।
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इसमें महिला और पुरुषों में काव्य के माध्यम से हंसी-ठिठोली होती थी, लेकिन अब सांखी की होली का रंग हल्का हो गया है। सांखी होली के लिए टोलियों की मांग नंदगांव ही नहीं दूर-दूर तक रहती। राजस्थान के कामां, भरतपुर, फतेहपुर सीकरी, हरियाणा के होडल, फिरोजपुर झिरका तक सांखी होली के लिए टोलियां जाती थीं।
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'अब आपस में इतना प्रेम नहीं रहा'
नंदगांव के विजेंद्र सरण गोस्वामी ने बताया कि नंदगांव से निकलने वाली टोली के पीछे-पीछे महिलाएं हाथों में लाठियां लेकर कृष्ण कुंड पर पहुंचती थीं। फिर शुरू होती थी सांखी की होली। पुरुष काव्य के रूप में सभ्य और शालीन भाषा में महिलाओं से हंसी-ठिठोली करते थे। इस पर महिलाएं लाठियां लेकर उनके पीछे भागतीं। महिलाएं भी सांखी का जवाब सांखी से ही देती थीं। अब आपस में इतना प्रेम नहीं रहा।
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'राग-द्वेष के चलते खत्म हो गई परंपरा'
साहित्यकार रामशरण शर्मा ने बताया कि काम की अधिकता और बढ़ते राग-द्वेष के चलते प्राचीन परंपरा खत्म हो गई है। करीब तीन दशक पूर्व रात भर चौपाइयों का दौर चलता था। दूरदराज से परदेसी लोग इसका आनंद लेने के लिए आते थे। आजकल चौपाइयां यदाकदा ही सुनने को मिलती हैं। कामां राजस्थान के लोग नंदगांव के लोगों को सांखी होली के लिए बुलाते थे।
सांखी के छंद
- यारी प्यारी जब लगै, तेरी एक जने ते होयवो यारी कहा काम की, तेरी जने जने ते होय।
- कोठे ऊपर कोठरी रे, वामे गढ़े सुनार, बिछुआ गढ़ दे बाजने, मेरी धमक सुनेंगे यार...।
- नीचें तेरे छींट कौ रे, ऊपर गोटा लालनेक घूंघट खोल दिखाय दै, तेरे नारंगी से गाल।
क्या है सांखी होली
सांखी की होली में महिलाओं और पुरुषों के दल आमने-सामने हो जाते हैं। पुरुष महिलाओं से ठिठोली करते हुए दोहा, पद, सवैया आदि का गायन करते हैं। महिलाएं भी ठिठोली करते हुए छंद में ही जवाब देती हैं। दोनों ओर से छंदों के अनुसार नृत्य और इशारे होते हैं।
साहित्यकार रामशरण शर्मा ने बताया कि काम की अधिकता और बढ़ते राग-द्वेष के चलते प्राचीन परंपरा खत्म हो गई है। करीब तीन दशक पूर्व रात भर चौपाइयों का दौर चलता था। दूरदराज से परदेसी लोग इसका आनंद लेने के लिए आते थे। आजकल चौपाइयां यदाकदा ही सुनने को मिलती हैं। कामां राजस्थान के लोग नंदगांव के लोगों को सांखी होली के लिए बुलाते थे।
सांखी के छंद
- यारी प्यारी जब लगै, तेरी एक जने ते होयवो यारी कहा काम की, तेरी जने जने ते होय।
- कोठे ऊपर कोठरी रे, वामे गढ़े सुनार, बिछुआ गढ़ दे बाजने, मेरी धमक सुनेंगे यार...।
- नीचें तेरे छींट कौ रे, ऊपर गोटा लालनेक घूंघट खोल दिखाय दै, तेरे नारंगी से गाल।
क्या है सांखी होली
सांखी की होली में महिलाओं और पुरुषों के दल आमने-सामने हो जाते हैं। पुरुष महिलाओं से ठिठोली करते हुए दोहा, पद, सवैया आदि का गायन करते हैं। महिलाएं भी ठिठोली करते हुए छंद में ही जवाब देती हैं। दोनों ओर से छंदों के अनुसार नृत्य और इशारे होते हैं।