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आगरा: अस्पतालों में इलाज के नाम पर मानवाधिकर हनन के मामले में चौथा केस दर्ज

Sun, 01 Aug 2021 04:16 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Sun, 01 Aug 2021 04:16 PM IST
सार

श्री पारस अस्पताल प्रकरण में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दो, एक शिकायत राज्य आयोग में पंजीकृत हुई हैं। 

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Fourth case registered for human rights abuses in the name of treatment in NHRC
पारस अस्पताल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाज के नाम पर मानवाधिकार हनन के आरोप में पिछले एक महीने में आगरा से चार केस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज हुए हैं। जिनमें तीन केस की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार और एक मामले में राज्य आयोग जांच करेगा। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि शासन-प्रशासन और पुलिस की जांच से विश्वास उठने के बाद उन्होंने न्याय के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में केस दर्ज कराए हैं।

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भगवान टॉकीज स्थित श्री पारस अस्पताल के मॉकड्रिल प्रकरण में तीन केस दर्ज हुए हैं। जगदीशपुरा निवासी बाल अधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस ने एनएचआरसी में सबसे पहले 15 जून को केस दर्ज कराया था। जिसमें उन्होंने अस्पताल में 22 मरीजों की हत्या और अस्पताल संचालक को बचाने में प्रशासन की मिलीभगत के आरोप लगाए हैं। 
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दूसरी शिकायत श्री पारस अस्पताल में 26 अप्रैल को अपने पिता और भाई की बहू को खोने वाले जीवनी मंडी निवासी अशोक चावला ने दर्ज कराई है। एनएचआरसी के अलावा तीसरी शिकायत पर अशोक चावला ने ही राज्य मानवाधिकार आयोग में भी दर्ज है। तीनों शिकायतों पर श्री पारस अस्पताल संचालक, जिला प्रशासन को जांच एजेंसी नोटिस जारी करेगी। 

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चौथी शिकायत सिकंदरा निवासी सचीश समाधिया ने पंजीकृत कराई है। पीड़ित का आरोप है कि कोविड हॉस्पिटल रामरघु में उपचार के दौरान उनकी पुत्री के साथ अशोभनीय घटना हो गई। आरोप है कि शिकायत करने और अस्पताल स्टाफ ने बदनामी के भय से पुत्री की हत्या कर दी। उन्होंने कहा कि बेटी कलक्ट्रेट बार एसोसिएशन में युवा महिला अधिवक्ता थी।  

पुलिस की कार्यशैली पर सवाल
श्री पारस अस्पताल प्रकरण में एक तरफ प्रशासन पर जांच में लीपापोती के आरोप हैं, दूसरी तरफ पीड़ित अब पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं। दहतोरा निवासी प्रियंका सिंह का कहना है कि पुलिस और प्रशासन दोनों मॉकड्रिल कांड में लिप्त हैं। मेरी मां की मौत ऑक्सीजन नहीं मिलने से हुई। हम ऑक्सीजन के लिए दर-दर भटकते रहे, लेकिन अप्रैल में ऑक्सीजन नहीं मिली। अस्पताल संचालक को सजा देने की बजाय अधिकारी आरोपित पर मेहरबान हैं। 

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