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Agra News: पांच दशक बाद भी बुराइयों के खिलाफ बुलंद है दुष्यंत की आवाज
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दुष्यंत कुमार के बेटे
- फोटो : दुष्यंत कुमार के बेटे
आगरा। पचास वर्ष बीत गए.... समय की यह लंबी यात्रा किसी व्यक्ति को स्मृति में बदल देती है, लेकिन दुष्यंत कुमार के साथ ऐसा नहीं हुआ। अपने नाम के अनुरूप महाकवि दुष्यंत आज भी मौजूद हैं—सड़कों पर, संसद में, अखबारों की सुर्खियों में और आम आदमी की बेचैन आंखों में।
मैं उन्हें एक कवि से पहले एक पिता के रूप में जानता हूं। एक ऐसे पिता जो शब्दों से उतना ही प्रेम करते थे, जितना सच से। घर के भीतर वो बेहद सहज, आत्मीय और संवेदनशील थे, लेकिन घर के बाहर उनके शब्द व्यवस्था से सवाल करते थे। उन्होंने कविता को शृंगार से निकालकर जनसंघर्ष की आवाज बना दिया। दुष्यंत कुमार ने कभी कविता को मनोरंजन नहीं माना। उनके लिए कविता एक जिम्मेदारी थी—समय के प्रति, समाज के प्रति और मनुष्य के प्रति। उन्होंने कहा था-
“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, अब तो हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
यह पंक्ति आज भी उतनी ही सटीक है जितनी अपने समय में थी। शायद इसलिए कि पीड़ा का स्वरूप बदला है, समाप्त नहीं हुई।
उनकी गजलें सत्ता के गलियारों में भी गूंजती रहीं और आम आदमी के दिल में भी। उन्होंने भाषा को सजाया नहीं, उसे ईमानदार बनाया। उनकी कविताओं में जो गुस्सा है, वह विनाश का नहीं, बदलाव का है। जो व्यंग्य है, वह कटु नहीं, करुणा से उपजा है। एक पुत्र के रूप में मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने हमें केवल साहित्यिक विरासत नहीं दी, बल्कि साहस, स्पष्टता और संवेदनशीलता की विरासत दी। उन्होंने सिखाया कि चुप रहना भी कभी-कभी अपराध हो सकता है और सच कहना हमेशा आसान नहीं होता।
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आज जब उनकी 50वीं पुण्यतिथि पर देश उन्हें याद कर रहा है, तो मुझे लगता है कि यह स्मरण केवल अतीत का नहीं, वर्तमान का दायित्व है। दुष्यंत कुमार को पढ़ना आज भी हमें सच बोलने की हिम्मत देता है- और यही किसी रचनाकार की सबसे बड़ी सफलता है।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां- “कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए, कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।” जब भी सुनता हूं, तो वह केवल एक शेर नहीं लगता, बल्कि उनके जीवन का सार लगता है। वे सचमुच चाहते थे कि रोशनी सब तक पहुंचे, बिना भेदभाव के।
पचास वर्ष बाद, जब नई पीढ़ी उनके शब्दों को पोस्टरों, नारों और सोशल मीडिया पर दोहराती है, तो लगता है कि पापा ने जो कहा था, वह केवल अपने समय के लिए नहीं था। उनकी कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि व्यवस्था आज भी सवालों से बचती है और आम आदमी आज भी जवाब ढूंढ रहा है। एक पुत्र के रूप में मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि लोग आज भी दुष्यंत कुमार को याद करते हैं। लेकिन उससे भी बड़ा गर्व यह है कि वे केवल याद नहीं किए जाते, पढ़े जाते हैं, दोहराए जाते हैं और जिये जाते हैं।
पचास वर्ष बीत गए हैं, लेकिन दुष्यंत कुमार स्मृति नहीं बने। वो चेतना हैं, वो सवाल हैं और वो आज भी हमारे समय की आवाज हैं। वो हर उस आवाज में हैं जो अन्याय के खिलाफ उठती है। पचास वर्ष बाद भी दुष्यंत कुमार हमारे समय के कवि हैं।
- कर्नल अपूर्व कुमार त्यागी (अवकाश प्राप्त)
लेखक कवि दुष्यंत कुमार के पुत्र हैं।
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मैं उन्हें एक कवि से पहले एक पिता के रूप में जानता हूं। एक ऐसे पिता जो शब्दों से उतना ही प्रेम करते थे, जितना सच से। घर के भीतर वो बेहद सहज, आत्मीय और संवेदनशील थे, लेकिन घर के बाहर उनके शब्द व्यवस्था से सवाल करते थे। उन्होंने कविता को शृंगार से निकालकर जनसंघर्ष की आवाज बना दिया। दुष्यंत कुमार ने कभी कविता को मनोरंजन नहीं माना। उनके लिए कविता एक जिम्मेदारी थी—समय के प्रति, समाज के प्रति और मनुष्य के प्रति। उन्होंने कहा था-
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“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, अब तो हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
यह पंक्ति आज भी उतनी ही सटीक है जितनी अपने समय में थी। शायद इसलिए कि पीड़ा का स्वरूप बदला है, समाप्त नहीं हुई।
उनकी गजलें सत्ता के गलियारों में भी गूंजती रहीं और आम आदमी के दिल में भी। उन्होंने भाषा को सजाया नहीं, उसे ईमानदार बनाया। उनकी कविताओं में जो गुस्सा है, वह विनाश का नहीं, बदलाव का है। जो व्यंग्य है, वह कटु नहीं, करुणा से उपजा है। एक पुत्र के रूप में मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने हमें केवल साहित्यिक विरासत नहीं दी, बल्कि साहस, स्पष्टता और संवेदनशीलता की विरासत दी। उन्होंने सिखाया कि चुप रहना भी कभी-कभी अपराध हो सकता है और सच कहना हमेशा आसान नहीं होता।
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आज जब उनकी 50वीं पुण्यतिथि पर देश उन्हें याद कर रहा है, तो मुझे लगता है कि यह स्मरण केवल अतीत का नहीं, वर्तमान का दायित्व है। दुष्यंत कुमार को पढ़ना आज भी हमें सच बोलने की हिम्मत देता है- और यही किसी रचनाकार की सबसे बड़ी सफलता है।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां- “कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए, कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।” जब भी सुनता हूं, तो वह केवल एक शेर नहीं लगता, बल्कि उनके जीवन का सार लगता है। वे सचमुच चाहते थे कि रोशनी सब तक पहुंचे, बिना भेदभाव के।
पचास वर्ष बाद, जब नई पीढ़ी उनके शब्दों को पोस्टरों, नारों और सोशल मीडिया पर दोहराती है, तो लगता है कि पापा ने जो कहा था, वह केवल अपने समय के लिए नहीं था। उनकी कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि व्यवस्था आज भी सवालों से बचती है और आम आदमी आज भी जवाब ढूंढ रहा है। एक पुत्र के रूप में मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि लोग आज भी दुष्यंत कुमार को याद करते हैं। लेकिन उससे भी बड़ा गर्व यह है कि वे केवल याद नहीं किए जाते, पढ़े जाते हैं, दोहराए जाते हैं और जिये जाते हैं।
पचास वर्ष बीत गए हैं, लेकिन दुष्यंत कुमार स्मृति नहीं बने। वो चेतना हैं, वो सवाल हैं और वो आज भी हमारे समय की आवाज हैं। वो हर उस आवाज में हैं जो अन्याय के खिलाफ उठती है। पचास वर्ष बाद भी दुष्यंत कुमार हमारे समय के कवि हैं।
- कर्नल अपूर्व कुमार त्यागी (अवकाश प्राप्त)
लेखक कवि दुष्यंत कुमार के पुत्र हैं।