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हारने नहीं दिया हौसला जीत ली जिंदगी की जंग
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कासगंज। इंसान बीमारी से एक बार और उसके खौफ से हर रोज मरता है। जब बात कैंसर की हो तो इस रोग का नाम सुनकर ही लोग जीवन का अंत समझ लेते हैं। लेकिन यह गलत है। अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो इसे मात दी जा सकती है। हम और की बात क्यों करें अपने ही जिले में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने न केवल उसे मात दी बल्कि अन्य पीड़ितों के लिए भी प्रेरणास्रोत बने हैं।
हार नहीं मानी, गले के कैंसर से लड़कर जीते
मजबूत हौसले व डॉक्टरों की मदद से गले के कैंसर जैसी बीमारी को मात दे दी। हालांकि दिल्ली में एक निजी अस्पताल में जांच कराने पर जब पहली बार पता लगा कि कैंसर की पुष्टि हुई है तो घबरा गए । एक बारगी लगा कि सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन हार नहीं मानी और कैंसर से लड़ने की ठान ली। नतीजा सामने है कि आज पूरी तरह स्वस्थ हूं। अपनी मेहनत से दैनिक कार्यों को बखूबी अंजाम दे रहा हूं - मनोज गुप्ता, किराना व्यवसायी।
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ब्लड कैंसर था, अब ठीक हूं
-18 वर्ष की उम्र है। इस उम्र में ब्लड कैंसर हो गया। मुंबई में इसकी पुष्टि हुई। फिर तो पूरा परिवार तनाव में आ गया। परिवार के लोग घबरा गए और मैं भी यह सोच बैठा कि शायद अब जान नहीं बचेगी, लेकिन अपनी इच्छा शक्ति कम नहीं होने दी। डॉक्टरों ने हिम्मत बंधाई और आज पूरी तरह स्वस्थ हूं। दवाओं का भी सहारा नहीं ले रहा हूं। हौसला रखना जरूरी है- विपिन कुमार, युवा।
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परिवार पर टूटा पहाड़ तो उठा लिया मदद का बीड़ा
मूल रूप से मैनपुरी के रहने वाले आस्तिक पांडे फिलहाल आवास विकास कॉलोनी में रहते हैं। वे कैंसर पीड़ितों के लिए हर संभव मदद में जुटे हैं। पिछले 2 साल में अब तक 10 कैंसर पीड़ितों को रक्तदान कर चुके हैं और आर्थिक सहयोग भी करते हैं। वे कहते हैं कि लगभग 12 साल पहले की बात है जब परिवार में ताऊ के बेटे समी पांडे और मुन्ना पंाडे कैंसर रोग से ग्रसित हुए। उस समय रक्तदाता भी सहज नहीं मिलते थे। दोनों ही तहेरे भाइयों की कैंसर से जान चली गई। तभी से मन बना लिया कि कैंसर पीड़ितों की हर संभव मदद करेंगे।
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न जांच न इलाज, मेडिकल कॉलेज पर टिकी हैं उम्मीदें
जहां एक ओर जिंदा दिली से कैंसर से जंग लड़कर जीत बोलने वाले लोग मिसाल बने हुए हैं तो हर साल इस असाध्य बीमारी के रोगियों की संख्या बढ़ भी रही है, लेकिन जिले में बीमारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास कोई इंतजाम नहीं हैं। इलाज तो दूर जिले में जंाच की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इधर, दो साल पहले बजट में कासगंज जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात मिली थी। अब इसके निर्माण पर कैंसर के इलाज की उम्मीद भी टिकी है, हालांकि अभी तक मेडिकल कॉलेज की निर्माण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है।
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क्या बोले सीएमओ
जिले में कैंसर की जांच और इलाज का कोई इंतजाम नहीं है। इलाज न होने के कारण जिले में कैंसर रोगियों का आंकड़ा भी नहीं रहता है। यदि मेडिकल कॉलेज बन जाता है तो कैंसर यूनिट की उम्मीद बढ़ जाएगी। कैंसर पीड़ित हौसला रखें। यह बीमारी अब लाइलाज नहीं है। उच्च स्वास्थ्य केंद्रों पर इसका इलाज संभव है - अनिल कुमार, सीएमओ।
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हार नहीं मानी, गले के कैंसर से लड़कर जीते
मजबूत हौसले व डॉक्टरों की मदद से गले के कैंसर जैसी बीमारी को मात दे दी। हालांकि दिल्ली में एक निजी अस्पताल में जांच कराने पर जब पहली बार पता लगा कि कैंसर की पुष्टि हुई है तो घबरा गए । एक बारगी लगा कि सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन हार नहीं मानी और कैंसर से लड़ने की ठान ली। नतीजा सामने है कि आज पूरी तरह स्वस्थ हूं। अपनी मेहनत से दैनिक कार्यों को बखूबी अंजाम दे रहा हूं - मनोज गुप्ता, किराना व्यवसायी।
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ब्लड कैंसर था, अब ठीक हूं
-18 वर्ष की उम्र है। इस उम्र में ब्लड कैंसर हो गया। मुंबई में इसकी पुष्टि हुई। फिर तो पूरा परिवार तनाव में आ गया। परिवार के लोग घबरा गए और मैं भी यह सोच बैठा कि शायद अब जान नहीं बचेगी, लेकिन अपनी इच्छा शक्ति कम नहीं होने दी। डॉक्टरों ने हिम्मत बंधाई और आज पूरी तरह स्वस्थ हूं। दवाओं का भी सहारा नहीं ले रहा हूं। हौसला रखना जरूरी है- विपिन कुमार, युवा।
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परिवार पर टूटा पहाड़ तो उठा लिया मदद का बीड़ा
मूल रूप से मैनपुरी के रहने वाले आस्तिक पांडे फिलहाल आवास विकास कॉलोनी में रहते हैं। वे कैंसर पीड़ितों के लिए हर संभव मदद में जुटे हैं। पिछले 2 साल में अब तक 10 कैंसर पीड़ितों को रक्तदान कर चुके हैं और आर्थिक सहयोग भी करते हैं। वे कहते हैं कि लगभग 12 साल पहले की बात है जब परिवार में ताऊ के बेटे समी पांडे और मुन्ना पंाडे कैंसर रोग से ग्रसित हुए। उस समय रक्तदाता भी सहज नहीं मिलते थे। दोनों ही तहेरे भाइयों की कैंसर से जान चली गई। तभी से मन बना लिया कि कैंसर पीड़ितों की हर संभव मदद करेंगे।
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न जांच न इलाज, मेडिकल कॉलेज पर टिकी हैं उम्मीदें
जहां एक ओर जिंदा दिली से कैंसर से जंग लड़कर जीत बोलने वाले लोग मिसाल बने हुए हैं तो हर साल इस असाध्य बीमारी के रोगियों की संख्या बढ़ भी रही है, लेकिन जिले में बीमारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास कोई इंतजाम नहीं हैं। इलाज तो दूर जिले में जंाच की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इधर, दो साल पहले बजट में कासगंज जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात मिली थी। अब इसके निर्माण पर कैंसर के इलाज की उम्मीद भी टिकी है, हालांकि अभी तक मेडिकल कॉलेज की निर्माण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है।
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क्या बोले सीएमओ
जिले में कैंसर की जांच और इलाज का कोई इंतजाम नहीं है। इलाज न होने के कारण जिले में कैंसर रोगियों का आंकड़ा भी नहीं रहता है। यदि मेडिकल कॉलेज बन जाता है तो कैंसर यूनिट की उम्मीद बढ़ जाएगी। कैंसर पीड़ित हौसला रखें। यह बीमारी अब लाइलाज नहीं है। उच्च स्वास्थ्य केंद्रों पर इसका इलाज संभव है - अनिल कुमार, सीएमओ।