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हाथरस हादसा: साकार हरि को भक्त समझते हैं विष्णु का स्वरूप...सत्संग में पूजा न धूप दीप; न करते धार्मिक अनुष्ठान

Fri, 05 Jul 2024 02:07 PM IST
भूपेन्द्र सिंह अमर उजाला न्यूज डेस्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज डेस्क, आगरा Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Fri, 05 Jul 2024 02:07 PM IST
सार

साकार हरि को उनके भक्त विष्णु का स्वरूप समझते हैं। लेकिन सत्संग में कभी पूजा नहीं होती। न धूप दीप जलता है। न ही धार्मिक अनुष्ठान किए जाते। 

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Devotees consider Saakar Hari to be form of Vishnu but no incense or lamps lit in Satsang nor any worship
नारायण साकार हरि भोले बाबा - फोटो : संवाद

विस्तार

यूपी के हाथरस में भोले बाबा के सत्संग में भगदड़ में 121 लोगों की जान चली गई। लोग बाबा साकार हरि को भगवान मानते हैं। जिस भोले बाबा को भक्त विष्णु और कृष्ण का स्वरूप, चमत्कारी और सिद्ध समझते हैं। उनके सत्संग में न कभी पूजा की थाली सजती, न दीपक और धूप जलती। न कोई धार्मिक अनुष्ठान और न कोई प्रतिमा पूजन होता। इस विरोधाभास के बीच ढाई दशक में ही सूरजपाल सिपाही से साकार विश्व हरि उर्फ भोले बाबा बन गए।

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कासगंज के पटियाली में जन्मे सूरजपाल के नाम समय के साथ बदलते गए। पहले वह भोले बाबा हुए। फिर नारायण साकार हरि और अब साकार विश्व हरि। इस सफर में भक्तों की आस्था भी अटूट होती गई। बाबा का नेटवर्क आगरा से शुरू हुआ और मध्य प्रदेश, राजस्थान व हरियाणा सहित कई राज्यों तक फैल गया। बाबा ने ट्रस्ट बनाया था। जिसका नाम पहले मानव सेवा आश्रम था, जो अब नारायण साकार हरि चैरिटेबल ट्रस्ट में बदल चुका है। बाबा के भक्तों में सर्वाधिक वंचित समाज से हैं।

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ख्याति साकार हरि के रूप में मिली

पटियाली के बहादुर नगर में रहने वाली बाबा की वृद्ध बहन का कहना है कि जब वह सरकारी नौकरी करते थे उसी दौरान उन्हें कुछ सिद्धियां प्राप्त हो गईं। वह चमत्कारिक रूप से अंगुली पर चक्र चलाते थे। अंगुली पर चक्र चलाने के कारण ही भक्त उन्हें विष्णु और कृष्ण का स्वरूप समझने लगे। इसके बाद उनकी ख्याति साकार हरि के रूप में हो गई।

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धार्मिक मंत्र या श्लोक भी नहीं पढ़े जाते

साकार हरि यानी कि साक्षात विष्णु। लेकिन, बाबा के सत्संग और प्रवचन में मीडिया कवरेज को लेकर भी कई प्रतिबंध रहते थे। स्टेज पर बैठकर जब बाबा बोलते तो उनके वीडियो बनाने पर रोक रहती। सेवादार ने बताया कि सत्संग में कभी कोई धार्मिक मंत्र या श्लोक आदि नहीं पढ़े जाते। न स्टेज पर विष्णु भगवान का कोई चित्र होता। न मालाएं चढ़ाई जातीं। प्रसाद में पूड़ी-सब्जी मिलती थी। बाबा सामाजिक और आर्थिक भेदभाव के संबंध में सत्संग में चर्चा करते थे।

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