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भारतीय संस्कृति ने दुनिया को दिया अहिंसा, करुणा और मैत्री का मंत्र: दलाई लामा

Mon, 23 Sep 2019 12:11 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा Published by: Abhishek Saxena Updated Mon, 23 Sep 2019 12:11 AM IST
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Dalai Lama Reach Raman Reti Temple Mathura Up India News in Hindi
धर्मगुरु दलाईलामा का यमुना जल से अभिषेक किया गया - फोटो : अमर उजाला
तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने कहा कि भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन है। अहिंसा, करुणा और मैत्री का मंत्र भी इसी संस्कृति ने दिया है। लिहाजा आज जरूरत है भारतीय संस्कृति के इस मंत्र को विश्व भर में फैलाने की। ताकि एक-दूसरे के प्रति जो नफरत फैल रही है उसे समाप्त किया जा सके। उन्होंने कहा कि आज अपनी इसी संस्कृति की बदौलत भारत विश्व की बड़ी ताकत बन रहा है।
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आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा दो दिवसीय धार्मिक यात्रा पर मथुरा आए हुए हैं। रविवार को रमणरेती धाम (महावन) में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए दलाई लामा ने कहा कि आज की सबसे बड़ी जरूरत विश्व में आपसी प्रेम की है। इसी से मुल्कों के बीच की दुश्मनी को दूर किया जा सकता है। एक शांत और नए विश्व का निर्माण किया जा सकता है। 
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उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा प्रेम का संदेश पूरी दुनिया को दिया है। भारत दुनिया भर को एक राह दिखा रहा है। दलाई लामा ने कहा कि भारतीय संस्कृति और संस्कृत का प्रचार प्रसार आज के समय में बहुत आवश्यक है। क्योंकि संस्कृति और संस्कृत का भी एक बड़ा रिश्ता है। समारोह में पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया, स्वामी गोविंदानंद, स्वामी हरदेवानंद, स्वामी दिव्यानंद, कार्ष्णि संत नागेंद्र दत्त गौड़ भी उपस्थित थे। 
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बच्चों को दिया शांति का संदेश

Dalai Lama Reach Raman Reti Temple Mathura Up India News in Hindi
आध्यात्मिक धर्मगुरु दलाई लामा पहुंचे रमणरेती आश्रम - फोटो : अमर उजाला
धार्मिक गुरु दलाई लामा ने समारोह में फिरोजाबाद के एचआईसी के विद्यार्थियों और वेद का ज्ञान ले रहे वेदपाठी बटुकों को शांति का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत और संस्कृति भारत की पहचान है। इनके उन्नयन और प्रसार की जिम्मेदारी आपके कंधों पर है। 

दलाई लामा ने वेद पाठी ब्राह्मणों से कहा कि आप जो संस्कृत के मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं इन मंत्रों को सुनकर मुझे बहुत ही आनंद की अनुभूति हो रही है। मैं संस्कृत में उतना विद्वान नहीं, लेकिन संस्कृत मुझे आनंदित करती है।
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