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पंचम तल से फोन आते ही बंधी अफसरों की घिग्घी
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा
Updated Tue, 16 Jun 2015 02:17 AM IST
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पुलिस सूत्रों की मानें तो दूध का दूध और पानी का पानी करने में लगे
अधिकारियों के पास जैसे ही पंचम तल से फोन आया, उनकी बुरी तरह से घिग्घी
बंध गई। कहा तो यहां तक जा रहा है कि एक वरिष्ठअधिकारी ने जांच में लगी
टीम के कई सदस्यों की मीटिंग लेकर आरोपों के घेरे में आए आला अधिकारियों को
बचाने के दिशा-निर्देश दिए। इसके बाद ही तय हुआ कि चार्जशीट में कोई बड़ा
नाम नहीं रखा जाएगा। अगर यह ‘ऑपरेशन’ कामयाब रहा तो आगे की जांच में दागी
अफसरों को क्लीन चिट दे दी जाएगी। अगर दबाव पड़ा तो उसी हिसाब से रणनीति तय
होगी?
दरअसल, जिन अफसरों पर घूस का रेट तय करने जैसे बेहद संगीन आरोप लगे हैं, उनके सपा नेताओं से करीबी रिश्ते रहे हैं। इन्हें सरकार का नजदीकी बताया जाता रहा। अगर ये अधिकारी जांच में फंस गए तो इसकी आंच सरकार तक पहुंच सकती है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि शैलेंद्र के रिश्ते सिर्फ अफसरों से ही नहीं, नेताओं से भी रहे। इसलिए शासन जांच को गहराई तक नहीं जाने देना चाहता।
पुलिस सूत्र बता रहे हैं कि चार दिन पहले ही पंचम तल से एक फोन आया, जिसके बाद एसआईटी से छोटे के लेकर बड़े सदस्य में हड़कंप मच गया। पुलिस सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि लखनऊ से एक आला अधिकारी ने आगरा के एक पुलिस अधिकारी से पूछा कि सीबीआई की टेक्निकल विंग से मिली रिपोर्ट मीडिया तक कैसे पहुंची?
सीबीआई की रिपोर्ट का क्या करेंगे?
जांच के घेरे में आए अधिकारियों को बचाने की कवायद तो शुरू कर दी गई है, लेकिन एक सवाल पूरी जांच टीम को परेशान किए हुए है। यह है सीबीआई की टेक्निकल विंग से मिली रिपोर्ट को कैसे छुपाया जा सकता है? दरअसल, शैलेंद्र अग्रवाल के मोबाइल का रिकार्ड पुलिस के साइबर एक्सपर्ट नहीं निकाल पाए थे। इसके लिए सीबीआई की मदद ली गई। अब सीबीआई की रिपोर्ट को कोर्ट के सामने रखना मजबूरी है। इसके अलावा डर यह भी है कि अगर यह रिपोर्ट केस डायरी में नहीं लिखी और मामले की सीबीआई जांच के आदेश हो गए तो जांच टीम फंस जाएगी।
‘ब्लैक मनी’ से लगा अफसरों के मुंह पर ताला
आगरा। बेखुदी बेसबब नहीं है गालिब, कुछ तो है जिसकी परदादारी है... आखिर शैलेंद्र की जालसाजी का शिकार अधिकारी एफआईआर दर्ज कराने सामने क्यों नहीं आ रहे हैं? पुलिस ने आयकर विभाग को बताया है कि इस जालसाज ने कम से कम 97 लोगों को ठगा है लेकिन रिपोर्ट अभी तक सिर्फ 28 ने ही दर्ज कराई है। इनमें अधिकारी एक भी नहीं है, जबकि उसने सबसे ज्यादा चूना अफसरों को ही लगाया। अब तो पुलिस भी यही मानकर चल रही है कि शैलेंद्र के झांसे में आए अफसरों ने उसे अपनी ब्लैक मनी दी थी। इन्हें डर है कि जुबां खोलते ही इनकम टैक्स में गर्दन फंस जाएगी। इसलिए लुटकर भी चुप बैठे रहने के लिए मजबूर हैं।
शैलेंद्र ने कई अफसरों को आलू में निवेश के नाम पर पैसा लेकर 36 फीसदी ब्याज दी। कई को ट्रांसफर-पोस्टिंग में घूस दिलाकर उनकी जेबें भरवाईं। फिर उनके पैसे को तीन साल से कम में डबल करके दिया। पुलिस सूत्रों का कहना है कि उसकी 36 परसेंट की स्कीम पुलिस प्रशासन में हिट हो गई थी।
डबल के लालच में आईपीएस और आईएएस तक जी खोलकर उसे पैसा देने लगे। इनमें से ज्यादातर का पैसा उसने हजम कर लिया। इसकी तसदीक उसके खिलाफ दर्ज पहली एफआईआर से भी होती है। इसमें दरोगा विजय सिंह की पत्नी श्वेया सिंह ने बताया है कि शैलेंद्र ने उनके पति के अलावा कई दरोगाओं, सिपाहियों, रिटायर्ड डीआईजी और व्यापारियों से काफी कैश लिया है। इसके बाद पुलिस ने आयकर को ऐसे 97 लोगों की सूची दी, जिन्होंने शैलेंद्र को मोटी रकम दी। लेकिन ये लोग रिपोर्ट दर्ज कराने नहीं आए हैं। पुलिस अधिकारियों में सिर्फ एक रिटायर्ड डीआईजी अनिल दास की पत्नी ने मुकदमा लिखवाया है। प्रशासन से कोई अधिकारी नहीं आया।
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--। दरोगाओं ने भी नहीं लिखवाया केस
शैलेंद्र के खिलाफ दर्ज पहली एफआईआर में श्वेता सिंह ने बताया है कि इस जालसाज ने उप निरीक्षक लक्ष्मण सिंह और जितेन्द्र दीखित, ( मथुरा ), उप निरीक्षक यशपाल सिंह (फीरोजाबाद), उप निरीक्षक छोटे लाल (अलीगढ़ ), उप निरीक्षक कामता प्रसाद (झांसी), उप निरीक्षक दुष्यंत तिवारी (आगरा) , कांस्टेबल असित कुमार (आगरा) समेत कई पुलिसकर्मियों और कई व्यापारियों से काफी कैश ले रखा है। इनमें से एक भी पुलिसकर्मी ने केस दर्ज नहीं कराया है। हालांकि पुलिस इनके बयान दर्ज करेगी।
--। मथुरा में एक भी एफआईआर नहीं
मथुरा के एसएसपी ने बाकायदा सभी थानों को निर्देश दिए कि शैलेंद्र अग्रवाल की जालसाजी के शिकार लोगों की रिपोर्ट तहरीर आते ही तुरंत दर्ज की जाए। इतना ही नहीं। एफआईआर दर्ज कराने के लिए लोगों से अपील भी की गई। लेकिन एक भी तहरीर नहीं आई जबकि पुलिस का मानना है कि आगरा से ज्यादा पीड़ित मथुरा में हैं। मथुरा में शैलेंद्र के रिश्तेदार सत्ताधारी दल में अहम पद पर हैं। माना जा रहा है कि उनके प्रभाव के चलते पीड़ित लोग आगे नहीं आ रहे।
दरअसल, जिन अफसरों पर घूस का रेट तय करने जैसे बेहद संगीन आरोप लगे हैं, उनके सपा नेताओं से करीबी रिश्ते रहे हैं। इन्हें सरकार का नजदीकी बताया जाता रहा। अगर ये अधिकारी जांच में फंस गए तो इसकी आंच सरकार तक पहुंच सकती है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि शैलेंद्र के रिश्ते सिर्फ अफसरों से ही नहीं, नेताओं से भी रहे। इसलिए शासन जांच को गहराई तक नहीं जाने देना चाहता।
पुलिस सूत्र बता रहे हैं कि चार दिन पहले ही पंचम तल से एक फोन आया, जिसके बाद एसआईटी से छोटे के लेकर बड़े सदस्य में हड़कंप मच गया। पुलिस सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि लखनऊ से एक आला अधिकारी ने आगरा के एक पुलिस अधिकारी से पूछा कि सीबीआई की टेक्निकल विंग से मिली रिपोर्ट मीडिया तक कैसे पहुंची?
सीबीआई की रिपोर्ट का क्या करेंगे?
जांच के घेरे में आए अधिकारियों को बचाने की कवायद तो शुरू कर दी गई है, लेकिन एक सवाल पूरी जांच टीम को परेशान किए हुए है। यह है सीबीआई की टेक्निकल विंग से मिली रिपोर्ट को कैसे छुपाया जा सकता है? दरअसल, शैलेंद्र अग्रवाल के मोबाइल का रिकार्ड पुलिस के साइबर एक्सपर्ट नहीं निकाल पाए थे। इसके लिए सीबीआई की मदद ली गई। अब सीबीआई की रिपोर्ट को कोर्ट के सामने रखना मजबूरी है। इसके अलावा डर यह भी है कि अगर यह रिपोर्ट केस डायरी में नहीं लिखी और मामले की सीबीआई जांच के आदेश हो गए तो जांच टीम फंस जाएगी।
‘ब्लैक मनी’ से लगा अफसरों के मुंह पर ताला
आगरा। बेखुदी बेसबब नहीं है गालिब, कुछ तो है जिसकी परदादारी है... आखिर शैलेंद्र की जालसाजी का शिकार अधिकारी एफआईआर दर्ज कराने सामने क्यों नहीं आ रहे हैं? पुलिस ने आयकर विभाग को बताया है कि इस जालसाज ने कम से कम 97 लोगों को ठगा है लेकिन रिपोर्ट अभी तक सिर्फ 28 ने ही दर्ज कराई है। इनमें अधिकारी एक भी नहीं है, जबकि उसने सबसे ज्यादा चूना अफसरों को ही लगाया। अब तो पुलिस भी यही मानकर चल रही है कि शैलेंद्र के झांसे में आए अफसरों ने उसे अपनी ब्लैक मनी दी थी। इन्हें डर है कि जुबां खोलते ही इनकम टैक्स में गर्दन फंस जाएगी। इसलिए लुटकर भी चुप बैठे रहने के लिए मजबूर हैं।
शैलेंद्र ने कई अफसरों को आलू में निवेश के नाम पर पैसा लेकर 36 फीसदी ब्याज दी। कई को ट्रांसफर-पोस्टिंग में घूस दिलाकर उनकी जेबें भरवाईं। फिर उनके पैसे को तीन साल से कम में डबल करके दिया। पुलिस सूत्रों का कहना है कि उसकी 36 परसेंट की स्कीम पुलिस प्रशासन में हिट हो गई थी।
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डबल के लालच में आईपीएस और आईएएस तक जी खोलकर उसे पैसा देने लगे। इनमें से ज्यादातर का पैसा उसने हजम कर लिया। इसकी तसदीक उसके खिलाफ दर्ज पहली एफआईआर से भी होती है। इसमें दरोगा विजय सिंह की पत्नी श्वेया सिंह ने बताया है कि शैलेंद्र ने उनके पति के अलावा कई दरोगाओं, सिपाहियों, रिटायर्ड डीआईजी और व्यापारियों से काफी कैश लिया है। इसके बाद पुलिस ने आयकर को ऐसे 97 लोगों की सूची दी, जिन्होंने शैलेंद्र को मोटी रकम दी। लेकिन ये लोग रिपोर्ट दर्ज कराने नहीं आए हैं। पुलिस अधिकारियों में सिर्फ एक रिटायर्ड डीआईजी अनिल दास की पत्नी ने मुकदमा लिखवाया है। प्रशासन से कोई अधिकारी नहीं आया।
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--। दरोगाओं ने भी नहीं लिखवाया केस
शैलेंद्र के खिलाफ दर्ज पहली एफआईआर में श्वेता सिंह ने बताया है कि इस जालसाज ने उप निरीक्षक लक्ष्मण सिंह और जितेन्द्र दीखित, ( मथुरा ), उप निरीक्षक यशपाल सिंह (फीरोजाबाद), उप निरीक्षक छोटे लाल (अलीगढ़ ), उप निरीक्षक कामता प्रसाद (झांसी), उप निरीक्षक दुष्यंत तिवारी (आगरा) , कांस्टेबल असित कुमार (आगरा) समेत कई पुलिसकर्मियों और कई व्यापारियों से काफी कैश ले रखा है। इनमें से एक भी पुलिसकर्मी ने केस दर्ज नहीं कराया है। हालांकि पुलिस इनके बयान दर्ज करेगी।
--। मथुरा में एक भी एफआईआर नहीं
मथुरा के एसएसपी ने बाकायदा सभी थानों को निर्देश दिए कि शैलेंद्र अग्रवाल की जालसाजी के शिकार लोगों की रिपोर्ट तहरीर आते ही तुरंत दर्ज की जाए। इतना ही नहीं। एफआईआर दर्ज कराने के लिए लोगों से अपील भी की गई। लेकिन एक भी तहरीर नहीं आई जबकि पुलिस का मानना है कि आगरा से ज्यादा पीड़ित मथुरा में हैं। मथुरा में शैलेंद्र के रिश्तेदार सत्ताधारी दल में अहम पद पर हैं। माना जा रहा है कि उनके प्रभाव के चलते पीड़ित लोग आगे नहीं आ रहे।