आगरा का अफगान से नाता: 1907 में आए थे अफगान शासक हबीबुल्लाह खान, अंग्रेजों के थे सरकारी मेहमान
15 जनवरी, 1907 के एक विशेष दिन का उल्लेख किया है। इस दिन अफगास्तिान के शासक हबीबुल्लाह खान अपने कुछ खास सहयोगियों के साथ आगरा आए थे। अंग्रेज वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो व लॉर्ड कर्जन ने उनकी अगवानी की थी।
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ताजनगरी से अफगानों का नाता पुराना है। व्यापारिक, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर दोनों के बीच गहरी दोस्ती रही है। करीब 114 साल पहले अफगानिस्तान के शासक हबीबुल्लाह खान अपने सहयोगियों के साथ ताजनगरी आए थे। अंग्रेजों की मेहमाननवाजी के दौरान उन्होंने ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुरसीकरी का दीदार किया था। कई सरकारी दस्तावेजों का आदान-प्रदान भी हुआ था।
अफगानिस्तान भारत के मित्र देशों में शामिल है। तमाम मौके हैं, जब दोनों देशों की दोस्ती मिसाल बनी। ताजनगरी भी इस मित्रता की गवाह रही है। बरसों से यहां अफगानों का आना-जाना जारी है। कई इतिहासकारों ने आगरा और अफगानों को लेकर 15 जनवरी, 1907 के एक विशेष दिन का उल्लेख किया है। इस दिन अफगास्तिान के शासक हबीबुल्लाह खान अपने कुछ खास सहयोगियों के साथ आगरा आए थे। अंग्रेज वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो व लॉर्ड कर्जन ने उनकी अगवानी की थी।
हबीबुल्लाह खान के लिए आगरा को दुल्हन की तरह सजाया गया था। सर जे डी ला टॉच व्यवस्था प्रमुख थे। मिलिट्री बैलून से उन्हें शहर दिखाया गया था। पोलो टूर्नामेंट (वायसराय कप) के वे मुख्य अतिथि भी रहे। ताजमहल के बाद वे आगरा किला पहुंचे। यहां उन्होंने करीब चार घंटे बिताए। 24 हॉर्स पावर की ऑरलींस कार से वे पूरे शहर में घूमे थे। फतेहपुरसीकरी का भी उन्होंने दीदार किया था। शाम को यमुना किनारे जबरदस्त आतिशबाजी भी हुई थी। अंग्रेजों के अलावा महाराजा सिंधिया व उस समय के देश के चोटी के लोगों से उन्होंने आगरा में ही मुलाकात की थी।
इस मुलाकात के पीछे भारत व अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक व सामरिक आदान-प्रदान थे। उस समय तमाम सरकारी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी हुए थे। आगरा के बाद वे कलकत्ता गए थे। हाल में भी तमाम अफगान नेता भारत और आगरा आते रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भी इनमें से एक हैं। पिछले महीने दस जुलाई को अफगानों का 25 सदस्यीय दल आगरा पहुंचा था। करीब डेढ़ घंटे तक उन्होंने फतेहपुरसीकरी में दीवान ए आम, दीवान ए खास, खजाना महल, बीरबल पैलेस, जोधाबाई पैलेस, मरियम पैलेस, अनूप तालाब, चौपड़, पंच महल आदि स्मारकों का दीदार किया था।
चमड़े के काम की हुई थी शुरुआत
ताजनगरी में चमड़े के काम की शुरुआत अफगानों से ही हुई थी। इतिहासकार राज किशोर राजे बताते हैं कि एक जमाने में अफगानिस्तान से उम्दा किस्म की हींग आती थी। मौजूदा हींग की मंडी में ही यह माल उतरता था। हींग को चमड़े के बड़े-बड़े थैलों में लाया जाता था। अफगान व्यापारी हींग के बदले पैसा लेकर यहां से रवाना हो जाते थे, चमड़े के थैले यहीं छोड़ जाते थे। स्थानीय लोग इन थैलों का इस्तेमाल चमड़े की वस्तुएं बनाने में करते थे। धीरे-धीरे आगरा चमड़े का बड़ा केंद्र बन गया।
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