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जमींदारी का मोह छोड़ बने थे क्रांतिकारी

Mon, 31 Jul 2017 11:41 PM IST
Updated Mon, 31 Jul 2017 11:41 PM IST
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जमींदारी का मोह छोड़ बने थे क्रांतिकारी
आवास - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
मैनपुरी। अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आजादी की हवा में सांस लेने के लिए न जाने कितने वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। देश की आजादी की खातिर महान क्रांतिकारी दम्मीलाल पांडेय ने जमींदारी का मोह छोड़कर देश की स्वतंत्रता के लिए जीवन दांव पर लगा दिया।
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मैनपुरी षड्यंत्र केस में शामिल रहे दम्मीलाल पांडेय ने क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी में भी अहम भूमिका निभाई। 45 वर्षों तक अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए क्रांतिकारी दम्मीलाल पांडेय को कई बार जेल जाकर कठोर यातनाएं झेलनी पड़ीं।
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भोगांव क्षेत्र के ग्राम आलीपुर पट्टी निवासी दम्मीलाल पांडेय का जन्म जमींदार भिखारीलाल पांडेय के घर वर्ष 1894 में हुआ था। आगरा कालेज में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए। मातृवेदी संस्था के लिए क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित और देवनारायण भारती के साथ ग्वालियर से हथियार लाते समय वह वर्ष 1917 में राजा मंडी रेलवे स्टेशन आगरा में पकड़े गए। क्रांतिकारियों के लिए धन जुटाने के लिए साथियों के साथ उन्होंने डाके भी डाले।
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वर्ष 1919 में मैनपुरी षड्यंत्र केस में शामिल दम्मीलाल को जेल जाना पड़ा। उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर वर्ष 1931-32 में नमक सत्याग्रह और वर्ष 1940-41 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में सक्रिय योगदान दिया। वहीं जब महात्मा गांधी ने वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ा आंदोलन का आह्वान किया तो वह आंदोलन में जुट गए और जिले भर में गुप्त बैठकें कर लोगों में आजादी का जज्बा पैदा करने का काम किया।

उन्होंने आजाद भारत में सांस लेने के बाद वर्ष 1955 में अंतिम सांस ली। यह विडंबना ही है कि उनके निधन के बाद से आज तक किसी ने गांव में उनकी स्मृति बनाए रखने के लिए स्मारक तक नहीं बनाया। यही कारण है कि आज की पीढ़ी इस महान क्रांतिकारी के बारे में कुछ भी नहीं जानती।

अंग्रेजों के खिलाफ नफरत पैदा करना बताते थे पेशा
दम्मीलाल पांडेय मुकद्दमों के दौरान न्यायाधीश द्वारा पेशा पूछे जाने पर निर्भीकता से जवाब देते थे कि मेरा पेशा है ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नफरत पैदा करना और असहयोग की भावना उत्पन्न करना है।

गोला बारूद से हमले की थी तैयारी
क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित के नेतृत्व में 80-85 क्रांतिकारियाें का संगठन था। जिसका मुख्यालय मैनपुरी में था। संगठन में कई विभागों में बंटकर देशभक्त आजादी के लिए कार्य करते थे। यूपी के अधिकांश हिस्सों में संगठन की शाखाएं भी थीं। ग्वालियर में भी संगठन के लोग थे। हथियार और गोला बारूद के बल पर अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ने वाले क्रांतिकारी प्रदेश और अन्य प्रदेशों से हथियार और गोला बारूद एकत्रित कर मैनपुरी लाते थे।


क्रांतिकारियों की योजना बड़े रूप में अंग्रेजों पर हमला करने की थी। वर्ष 1919 में संगठन के कई कार्यकर्ता हथियारों और गोला बारूद के साथ अंग्रेज पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। मैनपुरी से बड़ी मात्रा में हथियार और गोला बारूद बरामद किया गया। बाद में क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित को भी बंदी बना लिया गया। इसी को आजादी के इतिहास में मैनपुरी षड्यंत्र केस के नाम से जाना जाता है।
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