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कलम थामने की उम्र में थामी चिता की लकड़ी
Updated Thu, 14 Jun 2018 11:24 PM IST
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कलम थामने की उम्र में थामी चिता की लकड़ी
- फोटो : अमर उजाला
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एटा। मन में दुख, नन्हे हाथों में चिता की लकड़ी और भीड़ में पिता को खोजती नजरें। बिलखती मां को देख कभी रो पड़ता, तो कभी चाचा के कंधे से चिपक कर चुप हो जाता। परिवार में मचे कोहराम ने उसे बेचैन किया, लेकिन उस बेचैनी वजह में मासूम मन बार-बार पापा को याद कर बिलख रहा था। सब उसके पापा को श्रद्धांजलि देने आए थे, लेकिन नन्हें दर्ष को पापा के आने का इंतजार था। कलम थामने की उम्र में चिता की लकड़ी थामी, मगर उसे क्या पता था कि जिस चिता को वह मुखाग्नि दे रहा है, वह उसके प्यारे पापा हैं। गुरुवार को शहीद जवान रजनीश के ढाई साल के बेटे दर्ष का चेहरा देख सबकी आंखें नम हो गईं।
बुधवार को पिता के शहीद होने की खबर आई, तो घर में कोहराम मच गया। मगर नन्हा दर्ष इन सबसे अनजान था। मां को रोता देख बिलखा और रोया। कभी मां को चुप कराता और खुद बेचैन हो जाता। गुरुवार को बेटे की बेचैनी का आलम बढ़ता नजर आया। घर पर भीड़ देख शहीद जवान के बेटे की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। बाबा और चाचा की गोद में पिता की अंतिम यात्रा में सबके साथ शमशान घाट पहुंचा। इस दौरान भीड़ को चीर पिता को देखती दर्ष की नजरें आंखों में तमाम सवाल पाले हुए थीं। चिता सजाने के बाद मुखाग्रिन देने का वक्त आया, तो दर्ष के हाथ मेें लकड़ी थमा दी गई। एक बार तो वह समझ न सका कि आखिर ये सब क्या हो रहा है? जिन हाथों में कलम होनी थी, उन हाथों में पिता की मुखाग्नि देख हर आंख नम हो गई। मगर नन्हें दर्ष को फिर भी नहीं पता था कि ये उसके पापा हैं। जब चिता में आग लगने के बाद धुआं उठा, तो बेचैन मन में भरा गुबार निकला और मासूम फूट-फूट कर रोने लगा। ढाई साल के दर्ष की हालत देख सबको उसके भविष्य की चिंता सता रही थी। मगर मासूम मन बस अपने प्यारे पापा को टटोल रहा था। दुनियादारी से अनजान दर्ष को पिता की कमी का अंदाजा अभी भले न हो, लेकिन उसके हाल ने सबको जता दिया कि उसे पिता की शहादत पर गर्व है।
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बुधवार को पिता के शहीद होने की खबर आई, तो घर में कोहराम मच गया। मगर नन्हा दर्ष इन सबसे अनजान था। मां को रोता देख बिलखा और रोया। कभी मां को चुप कराता और खुद बेचैन हो जाता। गुरुवार को बेटे की बेचैनी का आलम बढ़ता नजर आया। घर पर भीड़ देख शहीद जवान के बेटे की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। बाबा और चाचा की गोद में पिता की अंतिम यात्रा में सबके साथ शमशान घाट पहुंचा। इस दौरान भीड़ को चीर पिता को देखती दर्ष की नजरें आंखों में तमाम सवाल पाले हुए थीं। चिता सजाने के बाद मुखाग्रिन देने का वक्त आया, तो दर्ष के हाथ मेें लकड़ी थमा दी गई। एक बार तो वह समझ न सका कि आखिर ये सब क्या हो रहा है? जिन हाथों में कलम होनी थी, उन हाथों में पिता की मुखाग्नि देख हर आंख नम हो गई। मगर नन्हें दर्ष को फिर भी नहीं पता था कि ये उसके पापा हैं। जब चिता में आग लगने के बाद धुआं उठा, तो बेचैन मन में भरा गुबार निकला और मासूम फूट-फूट कर रोने लगा। ढाई साल के दर्ष की हालत देख सबको उसके भविष्य की चिंता सता रही थी। मगर मासूम मन बस अपने प्यारे पापा को टटोल रहा था। दुनियादारी से अनजान दर्ष को पिता की कमी का अंदाजा अभी भले न हो, लेकिन उसके हाल ने सबको जता दिया कि उसे पिता की शहादत पर गर्व है।
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