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Himachal: डिमार्केशन की रिपोर्ट पर कब्जाधारी मानकर चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकते, हाईकोर्ट ने रद्द किया आदेश

Sat, 09 May 2026 12:00 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 09 May 2026 12:00 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने सोलन नगर निगम के वार्ड नंबर 3 से प्रत्याशी के नामांकन को रद्द करने के सहायक चुनाव अधिकारी के आदेश एमसी सोलन के को निरस्त कर दिया है। 

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high court: One cannot be barred from contesting elections on the basis of a encroachment demarcation report
अदालत(सांकेतिक)। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सोलन नगर निगम के वार्ड नंबर 3 से प्रत्याशी के नामांकन को रद्द करने के सहायक चुनाव अधिकारी के आदेश एमसी सोलन के को निरस्त कर दिया है। मामले में सुनवाई कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध और खामियों से भरा हुआ माना है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने कहा कि संदिग्ध सीमांकन (डिमार्केशन) की रिपोर्ट आधार पर किसी को अतिक्रमणकारी मानकर चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकते। कोर्ट ने 4 मई के आदेश को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता के नामांकन को बहाल करने का आदेश दिया। यह भी कहा कि इस फैसले से 21 अप्रैल को जारी चुनाव कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। याचिकाकर्ता पीयूष गर्ग ने सोलन नगर निगम चुनाव के लिए वार्ड नंबर 3 से पार्षद पद के लिए नामांकन भरा था।

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प्रतिवादी ने इस पर आपत्ति जताई थी कि उम्मीदवार का परिवार एक शिक्षण संस्था के माध्यम से सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का आरोपी है। इसी आधार पर 4 मई को रिटर्निंग अधिकारी ने हिमाचल प्रदेश नगर निगम एक्ट के तहत याचिकाकर्ता को अयोग्य घोषित कर दिया था। कोर्ट ने पाया कि प्रशासन की कार्रवाई में कई कानूनी खामियां हैं। प्रशासन ने साल 2014 की एक सीमांकन रिपोर्ट को आधार बनाया था, जिसे 10 साल तक ठंडे बस्ते में रखने के बाद अचानक 23 जनवरी 2024 को बिना किसी पक्ष को सुने कन्फर्म कर दिया गया। सहायक कलेक्टर ने पुरानी फाइल का हवाला देकर पक्षों को सुनने से मना कर दिया, जो कि भूमि राजस्व एक्ट की धारा 107 व लैंड रिकॉर्ड मैनुअल के विरुद्ध है। चुनाव अधिकारी ने नामांकन रद्द करते समय पंचायती राज अधिनियम की धाराओं का उल्लेख किया था, जबकि मामला नगर निगम अधिनियम के दायरे में आता था। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता के पिता की ओर से 2014 में दिए गए बयान को अतिक्रमण की स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता, क्योंकि उन्होंने भूमि वापसी की प्रक्रिया लंबित होने की बात कही थी।

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