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खेतीबाड़ी: चंबा माश, बरोट के लाल राजमा करेंगे आर्थिकी मजबूत, कृषि विश्वविद्यालय ने करवाया पंजीकरण
Fri, 28 Mar 2025 10:56 AM IST
Krishan Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, पालमपुर (कांगड़ा)
संवाद न्यूज एजेंसी, पालमपुर (कांगड़ा)
Published by: Krishan Singh
Updated Fri, 28 Mar 2025 10:56 AM IST
सार
हिमाचल इन दालों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। जिनमें मैदानी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली दालों की तुलना में बेहतर पकने की गुणवत्ता होती है। इन अनूठी प्रजातियों के पंजीकरण से किसानों को और अधिक लाभ होगा।
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चंबा माश, लाल राजमा व पीला राजमा।
- फोटो : संवाद
विस्तार
चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर ने किसानों की देसी फसलों की दुर्लभ और अनूठी प्रजातियों को नई दिल्ली स्थित पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (पीपीवीएफआरए) के साथ पंजीकृत करके एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। तीन महत्वपूर्ण दालों चंबा माश, बरोट का लाल राजमा और बरोट का पीला राजमा को उनके विशिष्ट ऑर्गेनोलेप्टिक स्वाद और बेहतरीन पकने की गुणवत्ता के कारण आधिकारिक तौर पर पंजीकृत किया गया है। कुलपति प्रो. नवीन कुमार ने पंजीकरण प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए आवश्यक डेटा और अनुसंधान तैयार करने के लिए डॉ. राकेश चहोता के प्रयासों की सराहना की।
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कुलपति ने किसानों की किस्मों को पंजीकृत करने के महत्वपूर्ण महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि हिमाचल इन दालों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। जिनमें मैदानी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली दालों की तुलना में बेहतर पकने की गुणवत्ता होती है। इन अनूठी प्रजातियों के पंजीकरण से किसानों को और अधिक लाभ होगा। अब उनके पास इन किस्मों के लिए विशेष विपणन अधिकार हैं, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि वे बाजार में प्रीमियम कीमतों तक पहुंच सकते हैं।
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एक बार इन के पंजीकृत होने के बाद, किसानों की किस्मों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाता है पंजीकरण पीद्धियों से इन किस्मों को संरक्षित और विकसित करने में किसानों के पारंपरिक ज्ञान और प्रयासों को भी स्वीकार करता है। इससे किसानों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनता है। इस तरह की पहल किसानों को कृषि उत्कृष्टता प्राप्त करने की दिशा में उनके सफर में बहुमूल्य साहायता प्रदान करती है। चंबा माश (एचपीसीएमआई), बरोट रेड राजमा (एचपीवीआआर-1) और बरोट यलो राजमा (एचपीवीआआर-2) का पंजीकरण हिमाचल के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और यह भारत में स्थानीय कृषि परंपराओं और किसानों के अधिकारों की मान्यता के लिए मिसाल कायम करता है।
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