देवाधिदेव महादेव से मिली संगीत की थाती को काशी के कलाकारों ने अपने हुनर से संवारा। शास्त्रीय संगीत से बनारस घराने ने अलग पहचान बनाई तो पूरब अंग की ठुमरी के लिए भी काशी जानी गई। बाबा विश्वनाथ की नगरी से बही संगीत यह धारा सात समंदर पार भी दिलों पर राज करती है। गौहर जान, पं. गुदइर महाराज, पं. किशन महाराज, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पद्मविभूषण गिरिजा देवी, पद्मभूषण पं. छन्नू लाल मिश्र, पद्मविभूषण पं. राजन साजन मिश्र से लेकर पद्मश्री मालिनी अवस्थी तक तमाम ऐसे नाम हैं, जिन्होंने यहां की संगीत परंपरा की धाक देश ही नहीं, विदेशों के मंच पर भी जमाई। बनारस घराने की इस परंपरा को युवा कलाकार उसी लगन से आगे बढ़ा रहे हैं...। आगे की स्लाइड्स में जानिए ऐसे ही कलाकारों के बारे में...
सात समंदर पार भी काशी के संगीत की झंकार, बनारस घराने को संवार रहे युवा कलाकार
सितार से कराया पूरब और पश्चिम का मेल :
सितार के तार झंकार गूंजी तो पूरब और पश्चिम एक हो गए। सितार वादन में पारंगत पंडित देवव्रत मिश्र 1994 से विदेशी मंचों पर अपना हुनर दिखा रहे हैं। वह काशी की संगीत परंपरा के नए सितारे हैं। उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने पिता सितार वादक पं. शिवनाथ मिश्र से ली है। उन्होंने बताया कि वह काशी की संगीत परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। संगीत के सुरों का ज्ञान नई पीढ़ी को भी दे रहे हैं। उन्हें अब तक काशी रत्न, बनारस रत्न, विभूति नारायण सिंह अवार्ड, युवा सितार वादक अवार्ड, संगीत शिखर अवार्ड और सुरमणि अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
सारंगी के तारों की चुनौती पार कर बढ़ाई परंपरा :
युवा सारंगी वादक अनीस मिश्रा बनारस घराने की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। विलुप्त होते वाद्य यंत्रों में शामिल सारंगी की विधा को अनीस मिश्रा 10 साल की उम्र से ही सीख रहे हैं। पं. कन्हैयालाल मिश्र से उन्होंने सारंगी की शिक्षा ग्रहण की है और उनकी ही परंपरा के तहत नए कलाकारों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित मंच और कलाकारों के साथ संगत करने वाले अनीस का कहना है कि सारंगी वादन बहुत ही कठिन है। उनके कहा- गुरु जी ने कहा कि जिस तरह उन्होंने सिखाया, वैसे ही तुम भी आने वाली पीढ़ी को सारंगी का प्रशिक्षण देना, ताकि यह विद्या जिंदा रहे।
बचपन से ही मिले संगीत के संस्कार :
शास्त्रीय गायक गौरव मिश्रा बनारस घराने के तबला सम्राट पंडित सामता प्रसाद मिश्र उर्फ गुदई महाराज के पौत्र हैं। संगीत के संस्कार उन्हें बचपन से ही मिले। शास्त्रीय गायन की प्रारंभिक शिक्षा पं. जालपा प्रसाद मिश्र से मिली। अब वह गायन की शिक्षा पं. पंकज मिश्र से ले रहे हैं। देश के प्रसिद्ध आयोजनों के अलावा उन्होंने विदेशों में भी प्रस्तुति दी। उन्हें पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज, पं. माता प्रसाद मिश्र, पं. रविशंकर मिश्र के साथ गायन का अवसर मिला। वर्तमान में वह स्वर काशिका म्यूजिक ग्रुप का भी संचालन कर रहे हैं।
कथक की चौथी पीढ़ी को आगे बढ़ा रहे विशाल :
नृत्य, संगीत और धुनों की त्रिवेणी को समेटे कथक नर्तक विशाल कृष्णा नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए नए प्रतिमान लिख रहे हैं। आचार्य सुखदेव महाराज के परिवार और बनारस घराने की चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले विशाल का प्रशिक्षण उनकी दादी कथक साम्राज्ञी सितारा देवी की देखरेख में शुरू हुआ। अपनी कला के लिए उन्हें शृंगार मणि, पं. बिरजू महाराज संगीत समृद्धि सम्मान, बिस्मिल्लाह खान युवा सम्मान, कला विभूति सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में वह कथक की विधा में नई पीढ़ी को भी पारंगत कर रहे हैं। देश के लगभग सभी बड़े मंचों के अलावा विदेशों में भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया है।