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Women's Day: समाज की बंदिशों को तोड़ किया हर मैदान फतह, फिर सबने कहा बेटियां हो तो ऐसी

Wed, 06 Mar 2019 06:54 PM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Wed, 06 Mar 2019 06:54 PM IST
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Women day special on sports women of varanasi
womens day - फोटो : amar ujala

कोमल है, कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है... बनारस की ये महिला खिलाड़ी इन पंक्तियों को सार्थक कर रही हैं। वह देश ही नहीं, विदेश में भी अपनी ताकत और प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रस्तुत है ऐसी ही सशक्त महिलाओं की कहानी जो समाज की बंदिशों को तोड़ते हुए कामयाबी के पथ पर चल रही हैं। आज सभी लोग उन्हें देख के कहते है कि बेटियां हो तो ऐसी। पढ़ें उनकी कहानियां आगे की स्लाइड्स में...

Women day special on sports women of varanasi
divya singh - फोटो : amar ujala

रूढ़ियां तोड़ बनीं बास्केटबॉल टीम का कप्तान

भारतीय महिला राष्ट्रीय बास्केटबॉल टीम की पूर्व कप्तान दिव्या सिंह जिस परिवार से आती हैं, वहां लड़कियों का खेलना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन दिव्या ने खुद के लिए वह चुना, जिसे सबसे ज्यादा प्यार करती थीं और वह था बास्केटबॉल। हालांकि पिता गौरी शंकर चाहते थे बेटी पढ़ाई करे, लेकिन मां उर्मिला ने बेटी के जुनून को समझा और उन्हें खेल के लिए प्रोत्साहित किया। 14 साल की उम्र में दिव्या ने जिला जूनियर टीम से खेल कॅरियर की शुरुआत की। प्रतिभाशाली दिव्या को दो साल बाद उत्तर प्रदेश की टीम का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। वर्ष 2000 में भारतीय राष्ट्रीय टीम में सेलेक्शन हुआ। उनके अंतर्राष्ट्रीय कॅरियर के मुख्य आकर्षण में 2005 में 20वीं एशियाई बास्केटबॉल परिसंघ चैंपियनशिप में रजत, 2006 में थाईलैंड में प्रथम फुकेट अंतर्राष्ट्रीय आमंत्रण बास्केटबॉल चैंपियनशिप में स्वर्ण, मेलबर्न में 2006 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय टीम के कप्तान के रूप में भूमिका निभाई। 2007 में इंचियोन में महिलाओं के लिए एफआईबीए एशिया चैंपियनशिप में 5वां स्थान हासिल किया। दिव्या ने खेल प्रबंधन में यूनिवर्सिटी ऑफ डेलावेयर, नेवार्क यूएस से किया है और यहीं महिला बास्केटबॉल टीम की सहायक कोच के रूप में काम भी किया है। इन्हें भारत गौरव अवार्ड फॉर एक्सेलेंस इन स्पोर्ट्स के साथ उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से रानी लक्ष्मीबाई वीरता अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इस समय वह एमटीएनएल में कार्यरत हैं। 

Women day special on sports women of varanasi
Guma thapa - फोटो : amar ujala

पिता के सपने ने बनाया वुशू चैंपियन

जब लक्ष्य निर्धारित होता है तो बड़े से बड़ा मुकाम भी आसानी से हासिल किया जा सकता है। सामान्य परिवार में जन्मी फुलवारिया की गुमा थापा ने भी अपने लक्ष्य निर्धारित किया। पिता तारा बहादुर थापा ने बेटी की सफलता का सपना देखा तो गुमा ने उसे सच कर दिखाया। गुमा ने 11 साल की आयु में कराटे से खेल कॅरियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा। कराते के बाद किक बॉक्सिंग और उसके बाद वुशू में कामयाबी हासिल किया। गुमा की माने तो लड़कियों की इस खेल में कम हिस्सेदारी के चलते बड़ा संघर्ष करना पड़ा। गुमा अपनी मेहनत से वुशु में राष्ट्रीय स्तर पर पांच स्वर्ण, तीन रजत, तीन कांस्य जीत चुकी हैं। वहीं किक बॉक्सिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक रजत, राष्ट्रीय स्तर पर आठ स्वर्ण, एक कांस्य, कराते में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक रजत, राष्ट्रीय स्तर पर आठ स्वर्ण, एक रजत जीता है। गुमा को बीएचयू की ओर से 2016-2017 के लिए बेस्ट एथलीट का अवार्ड मिल चुका हे। 2018 में इन्होंने एमपीएड की पढ़ाई पूरी की है।

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Women day special on sports women of varanasi
bindu sarki - फोटो : amar ujala

खेल के साथ पढ़ाई में भी अव्वल 

परिवार के किसी भी सदस्य का खेल से कोई नाता नहीं था, लेकिन फुलवरिया की बिंदू सारकी को खेल का मैदान बुला रहा था। उन्होंने पढ़ाई के साथ खेल को अपने जीवन का अहम हिस्सा बना लिया। बिंदू ने खेल की शुरुआत तो वॉलीबाल से की, लेकिन जब सुरक्षा की बात आती तो पिता तेग बहादुर चिंता में रहते थे। इसने बिंदू को कराते सीखने के लिए प्रेरित किया। बिंदू ने अपने स्ट्रेथ पर काम किया जिसकी बदौलत वो वुशू में राज्य स्तरीय रेफरी और कोच के पद पर भी कार्यरत रह चुकी है। वुशू में राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वर्ण, दो रजत, पांच कांस्य पदक जीत चुकी है,  किक बॉक्सिंग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक कांस्य, सात स्वर्ण और एक रजत पदक के साथ कराते में राष्ट्रीय स्तर पर तीन स्वर्ण भी हासिल कर चुकी है। खेलों के साथ बिंदू ने 2018 में बीएचयू से एमपीएड की पढ़ाई भी उत्तीर्ण की है।

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Women day special on sports women of varanasi
priyanka singh - फोटो : amar ujala
गांव में नंगे पैर दौड़ीं और बन गईं एथलीट

बेटियों को खेल के मैदान में क्यों भेजते हो? शॉर्ट स्कर्ट पहनकर जब घर की बेटी खेलती है तो अच्छा नहीं लगता। ये ऐसे सवाल थे जो अक्सर लोग प्रियंका को खेलने जाते देखकर उनके पिता से करते थे। लेकिन बढै़नी के पास कंठीपुर गांव के एक साधारण किसान की बेटी प्रियंका में खेल के प्रति ऐसा जुनून था, जिसके लिए वह गांव से एक किलोमीटर दूर नंगे पांव अभ्यास करने चली जातीं। इसी मेहनत और लगन की बदौलत कक्षा सात के दौरान वह पहली बार राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेने तिरुवनंतपुरम गईं। अब वह अंतर्राष्ट्रीय एथलीट हैं। प्रियंका ने राष्ट्रीय खेलों में 3000 मीटर स्टेपल चेज स्पर्धा में यूपी का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण पदक जीता। लगातार दो साल मुंबई हाफ मैराथन की चैंपियन प्रियंका फेडरेशन कप और ओपन नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप के साथ ही इंटर स्टेट चैंपियनशिप में यूपी का प्रतिनिधित्व करते हुए 800 मीटर, 1500 मीटर और 3000 मीटर स्टेपल चेज में पदक जीत चुकी हैं। वर्तमान में वह नार्थ ईस्टर्न रेलवे बनारस में बतौर टीई के पद पर कार्यरत हैं।
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