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आजादी के आंदोलन के साक्षी रहे हैं बनारस के यह किताब घर
तबस्सुम, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Tue, 24 Apr 2018 01:02 PM IST
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वर्तमान दौर इंटरनेट का है। खासकर मोबाइल क्रांति के बाद काफी कुछ बदलाव आ गया है। ऐसे में सवाल भी उठने शुरू हो गए हैं कि क्या किताबों का दौर खत्म होने वाला है। विश्व पुस्तक दिवस पर बनारस के किताब घरों में ताकाझांकी से जो दिखा, उससे इतना तो तय है कि किताबों की अहमियत हमेशा रहेगी। सौ साल से भी ज्यादा पुरानी और आजादी के आंदोलन के साक्षी रहे इन किताब घरों में आज भी लोगों का आना जाना है, वो इतर है कि वहां आने-जाने वालों की तादाद में भले कमी आ गई है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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बनारस के बांसफाटक पर काशी का सबसे पुराना वाचनालय है, कारमाइकल लाइब्रेरी। चौक क्षेत्र में अंग्रेजों के जमाने की और क्रांति के कई पलों की साक्षी। ये चंद्रशेखर आजाद समेत कई क्रांतिकारियों का ठिकाना रहा। चंद्रशेखर की अगुवाई में यहीं से गुपचुप तरीके से रणभेरी पत्रिका निकाली। देश की पुरानी लाइब्रेरी में शुमार इस वाचनालय में 18वीं व 19वीं शताब्दी की पुस्तकें संग्रहीत हैं।
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स्वामी करपात्री महाराज की वेदार्थ पारिजात से लेकर मानस पीयूष, श्रीकृष्ण चरित्र मानस, द इंस्टीट्यूट्स ऑफ मनु जैसी पुस्तकें यहां मौजूद हैं। 70 हजार पुस्तकें यहां की शान हैं। 1872 में इस लाइब्रेरी की शुरुआत संकठा प्रसाद खत्री ने बनारस के कमिश्नर सीपी कारमाइकल के नाम पर की। काशी नरेश व महाराजा विजयानगरम् ने सहयोग किया।
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संगठन के महामंत्री कपिल नारायण पांडेय बताते हैं कि यहां दुर्लभ पुस्तकों का ऐसा संग्रह है कि आज भी अमेरिका और यूरोप से शोधार्थी यहां आते हैं। इतनी पुरानी लाइब्रेरी के अस्तित्व पर फिलहाल संकट मंडरा रहा है। विश्वनाथ कॉरिडोर के चलते सरकार लाइब्रेरी के इस भवन को लेना चाह रही हैं।
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उधर, चेतगंज में भी 90 साल पुराना सरस्वती सदन वाचनालय व पुस्तकालय ऐतिहासिक किस्सा संजोए हुए है। 1927 में इस लाइब्रेरी को पूर्व सांसद शंकर प्रसाद जायसवाल के प्रयास से शुरू किया गया। आजादी के दौर में ये लाइब्रेरी भी क्रांतिकारियों का गढ़ हुआ करती थी। चंद्रशेखर आजाद यहां गुप्त बैठकें किया करते थे। लाइब्रेरी की ये संपत्ति खेदन लाल ने दान में दी थी।