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पुण्यतिथि आजः स्वामी विवेकानंद को वाराणसी में ही हो गया था मृत्यु का आभास, यहीं लिया था शिकागो जाने का निर्णय

Sun, 04 Jul 2021 02:31 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Sun, 04 Jul 2021 02:31 PM IST
सार

स्वामी विवेकानंद ने काशी भ्रमण के दौरान ही शिकागो जाने का निर्णय लिया था। उन्होंने वर्ष 1889 में प्रतिज्ञा की थी कि शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि यानी आदर्श की उपलब्धि करूंगा, नहीं तो देह का ही नाश कर दूंगा।

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Swami Vivekananda Death Anniversary he  had sense of death in Varanasi itself Here he decision to go to Chicago
स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद पांच बार काशी आए थे। उनको काशी में ही अपनी मृत्यु का आभास हो गया था। इसका जिक्र उन्होंने अपने पत्र में भी किया था। एलटी कॉलेज परिसर के गोपाल लाल विला में प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद ने सात पत्र लिखे थे। चार जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए। उन्होंने 39 वर्ष पांच माह, 24 दिन की अल्प आयु में शरीर त्याग दिया था। वर्ष 1902 में जब वो बनारस आए तो बीमार थे। यहीं ठहरे व एक माह तक स्वास्थ्य लाभ किया। चार जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए।



उन्होंने 39 वर्ष पांच माह, 24 दिन की अल्प आयु में शरीर त्यागा। स्वामी विवेकानंद ने काशी भ्रमण के दौरान ही शिकागो जाने का निर्णय लिया था। उन्होंने वर्ष 1889 में प्रतिज्ञा की थी कि शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि यानी आदर्श की उपलब्धि करूंगा, नहीं तो देह का ही नाश कर दूंगा।

स्वामी विवेकानंद पर अध्ययन कर रहे नित्यानंद राय ने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने काशी के अंतिम प्रवास के दौरान गोपाल लाल विला से सात पत्र लिखे थे। नौ फरवरी 1902 को स्वामी स्वरूपानंद को लिखे पत्र में स्वामीजी ने कहा था कि काशी प्रवास के दौरान मुझे बौद्धधर्म के बारे में बहुत सा ज्ञान प्राप्त हुआ। 

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वाराणसी का एलटी कॉलेज परिसर जर्जर हालत में, स्वामी विवेकानंद ने किया प्रवास - फोटो : अमर उजाला
बौद्धों ने शैवों के तीर्थस्थल को लेने का प्रयास किया लेकिन असफल होने पर उन्हीं के नजदीक नए स्थान बनाए, जैसे बोध गया, सारनाथ आदि। अपने शिष्य चारू को कहते हैं कि वह ब्रह्म सूत्र का स्वयं अध्ययन करे और मूर्खतापूर्ण बातों से प्रभावित ना हो। वह आगे लिखते हैं कि काशी में अच्छा हूं और यदि इसी तरह मेरा स्वास्थ्य सुधरता जाएगा तो मुझे बड़ा लाभ होगा लेकिन अगली ही लाइन में वह कहते हैं कि बौद्ध धर्म और नव हिंदू धर्म के संबंध के विषय में मेरे विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। इन विचारों को निश्चित रूप देने के लिए कदाचित मैं जीवित ना रहूं, परंतु उसकी कार्यप्रणाली का संकेत छोड़ जाऊंगा और तुम्हें और तुम्हारे भाई जनों  को उस पर काम करना होगा।
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वाराणसी का एलटी कॉलेज परिसर जर्जर हालत में, स्वामी विवेकानंद ने किया प्रवास - फोटो : अमर उजाला
स्वामी विवेकानंद ने दूसरा पत्र 10 फरवरी को ओली बुल को लिखा था और इसमें काशी के कलाकारों की प्रशंसा की थी। 12 फरवरी को भगिनी निवेदिता को लिखे गए पत्र में आशीर्वाद देते हुए लिखा था कि यदि श्रीरामकृष्ण सत्य हों तो उन्होंने जिस प्रकार मेरे जीवन में मार्गदर्शन किया है ठीक उसी प्रकार तुम्हें भी मार्ग दिखाकर अग्रसर करते रहें। चौथे पत्र में स्वामी ब्रह्मानंद को 12 फरवरी को लिखते हुए आदेशित किया कि प्रभु के निर्देशानुसार कार्य करते रहना। 
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वाराणसी का एलटी कॉलेज परिसर जर्जर हालत में, स्वामी विवेकानंद ने किया प्रवास - फोटो : अमर उजाला
18 फरवरी को पांचवां पत्र ब्रह्मानंद को और 21 फरवरी को ब्रह्मानंद को लिखे पत्र में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि कलकत्ते और इलाहाबाद में प्लेग फैल चुका है, काशी में फैलेगा कि नहीं, नहीं जानता...। सातवें और अंतिम पत्र में 24 फरवरी को ब्रह्मानंद को संबोधित करते हुए स्वामी जी ने पत्र का जवाब नहीं लिखने पर नाराजगी जताई और लिखा कि एक मामूली सी चिट्ठी लिखने में इतना कष्ट और विलंब। ...तो मैं चैन की सांस लूंगा। पर कौन जानता है उसके मिलने में कितने महीने लगते हैं... और 4 जुलाई 1904 को वे महासमाधि में लीन हो गए।
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swami vivekananda - फोटो : Social Media
आरएसएस के राम कुमार गुप्ता ने बताया कि 12 जनवरी, 1863 को उनका जन्म हुआ और मां ने उनका बचपन का नाम वीरेश्वर रखा। बाद में जब स्कूल में गए तो नरेंद्रनाथ नाम रखा गया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में आने पर स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए। संकठा मंदिर के पीछे स्थित कात्यायनी मंदिर के गर्भगृह में आत्म वीरेश्वर महादेव विराजमान हैं जिसकी दीवारों पर स्वामी विवेकानंद के माता-पिता भुवनेश्वरी देवी व विश्वनाथ दत्त की भी तस्वीर लगी हैैं।
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