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काशी में यहीं से शुरू हुई थी दुर्गा पूजा, यहां बुना गया बीएचयू का सपना, जानें इसका रोचक इतिहास
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Thu, 18 Oct 2018 09:49 AM IST
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varanasi
- फोटो : अमर उजाला
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काशी के ऐतिहासिक धरोहरों की संख्या अनगिनत है, सभी अपने में एक इतिहास समेटे हुए हैं। इन्हीं में एक ऐसी धरोहर शामिल है जिसने कोलकाता के दुर्गा पूजा को काशी में लाने का काम किया। वो धरोहर है काशी के संकरी गलियों में विराजमान बंगाली ड्योढ़ी। कहते हैं काशी में दुर्गा पूजा की शुरुआत यहीं से शुरू हुई। परंपरागत तरीके से आज भी हर साल बंगाली ड्योढ़ी में दुर्गा पूजा मनाई जाती है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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वाराणसी के ठठेरी बाजार की संकरी गलियों से होते हुए भारतेंदु भवन से आगे लगभग 44 बिस्वा में ये बंगाली ड्योढ़ी की हवेली है। पूरे इलाके में यह ऐसी हवेली जिसके रास्ते तीन गलियों में चौखंभा, भिखारीदास लेन व सुतटोला में खुलते हैं। 1773 में कोलकाता के व्यापार आनंदमय मित्रा काशी आकर बस गए हैं।
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व्यापारिक घराने से होने के कारण उन्होंने चौखंभा में हवेली बनवाई जिसे बंगाली ड्योढ़ी के नाम से जाना जाता है। तब से इस हवेली में कोलकाता की तर्ज पर ही दुर्गा पूजा शुरू हुई और यह परंपरा अभी तक चली आ रही है।
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ड्योढ़ी के पास दुकान चलाने वाले राजीव बताते हैं कि 300 साल पुराने इस भवन में स्थित दुर्गा मंदिर में स्थित विग्रह डोली में बैठकर आती है और पालकी में बैठकर जाती है। यह इनकी पारिवारिक परंपरा है। बंगाली ड्योढ़ी की दुर्गा पूजा एवं पूजा विधि का जिक्र भारतेंदु हरिश्चंद्र ने प्रेमयोगिनी में भी किया है। सार्वजनिक एवं संस्थागत पूजाएं बहुत बाद में आरंभ हुई।
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इस ड्योढ़ी में 1773 से ही लक्ष्मी पूजा व रथयात्रा की पूजा भी होती है। पूरी ड्योढ़ी एक भूलभुलैया जैसी प्रतीत होती है। हवेली के बीच में एक आंगन भी है जिसके चारों ओर कमरे बने हुए हैं। इस हवेली के हिस्से एक और इतिहास जुड़ा है।