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काफी कठिन था गीतकार समीर का काशी से मुंबई का सफर, बोले- बनारस हमेशा मुझमें जिंदा है

Tue, 02 Jul 2019 04:48 PM IST
Sayali Maurya आलोक कुमार त्रिपाठी,अमर उजाला,वाराणसी
आलोक कुमार त्रिपाठी,अमर उजाला,वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Tue, 02 Jul 2019 04:48 PM IST
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Lyricist Sameer anjaan struggle for songs and career from Varanasi to Mumbai
समीर अंजान

हम सारी उम्र जिनको समझते हैं अजनबी, उन्हीं से कोई वास्ता निकलता है...। कुछ ऐसा ही मिजाज है मेरे शहर बनारस का। प्रख्यात बॉलीवुड गीतकार समीर उर्फ शीतला प्रसाद पांडेय कहते हैं कि भले मैं बनारस से दूर हूं, लेकिन बनारस हमेशा मुझमें जिंदा रहता है। जहां भी जाता हूं वहां यही मेरी पहचान बनता है। बनारस मेरी जन्मभूमि है तो उससे बड़ा गौरव मेरे लिए कुछ हो ही नहीं सकता। बनारस की हर मायने में अपनी विशेषता है, खूबी है, अपना एक चरित्र है, अपनी एक विरासत है जिसको इस शहर ने संभाल कर रखा है। बनारस की आबोहवा में कहीं न कहीं कला, साहित्य और संगीत है। 

Lyricist Sameer anjaan struggle for songs and career from Varanasi to Mumbai

बॉलीवुड का ग्लैमरस संसार कवि हृदय को समीर के नाम से जानता है तो अपना बनारस इन्हें शीतला प्रसाद पांडेय के नाम से बुलाता है। बचपन की चर्चा आते ही पुरानी यादें ताजा हो गईं। खेलते-कूदते, गाते-गुनगुनाते बीता बचपन। कच्चे मकान, तालाब, पोखरे, नाले। ओल्हा-पाती, गुल्ली-डंडा, लुकाछिपी। भैंस की असवारी और पोखरे में छपाछप की वो मस्ती। पगडंडियों से होकर बाजार जाना, गेहूं पिसाना। प्राइमरी स्कूल में पढ़ते समय अक्सर कक्षा से गायब हो जाना। गांव का वह सावन, भादो, मेढ़कों की टर्र-टर्र, उन्हें सब याद है। 

Lyricist Sameer anjaan struggle for songs and career from Varanasi to Mumbai
- फोटो : social media

समीर ने बताया कि प्राइमरी की पढ़ाई के बाद बीएचयू से एमकॉम की पढ़ाई पूरी की और 1980 में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 2-3 दिन तक काम भी किया। उसके बाद मैंने एक फैसला लिया कि जो मैं काम कर रहा हूं वो ठीक नहीं है और दिल कह रहा था कि मेरी मंजिल कहीं और है। फिर मैंने 6 अप्रैल 1980 को मां से 500 रुपये लेकर काशी एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी और मुंबई आ गया। मेरे पिता स्व. अंजान साहब यहां मुंबई में थे और उनका बड़ा नाम हुआ करता था, तो मुझे लगता है कि कहीं न कहीं पोएट्री मेरी रगों में थी। 

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समीर ने बताया कि पिताजी इस बात के खिलाफ थे कि मैं इंडस्ट्री में आऊं, क्योंकि उन्होंने बहुत ही लंबा संघर्ष किया था। पिता जी ने दो टूक कहा- जितना पैसा मांगोगे दूंगा लेकिन जिस दिन तुम गाने की लाइन बताने के लिए कहोगे, उसी दिन तुम्हें घर से निकाल दूंगा। हालांकि इसके बाद उन्होंने फिल्मी धुनों आदि के बारे में शुरुआती प्रशिक्षण दिया। अपने ढंग से ट्रेंड किया। आज जो कुछ हूं उन्हीं की ट्रेनिंग की बदौलत हूं। कभी मेरी लिखी पंक्ति अच्छी लगती तो मामूली तारीफ करते, लेकिन साथ में यह भी कहते कि इसे और बेहतर कर सकते हो।

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दिल फिल्म का दृश्य - फोटो : file photo

समीर ने कहा कि मुंबई में ऐसा कोई दर्द नहीं है, जिसे मैंने न झेला हो। लोगों की तरफ से काफी अवहेलना मिली और कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया था कि तुम कभी गीतकार बन ही नहीं सकते। लेकिन उस दौरान मुझे पिताजी की पंक्ति जहन में आती थी कि ‘जग अभी जीता नहीं है, मैं अभी हारा नहीं हूं...’। मेरे भीतर लड़ने की ताकत थी और लगभग 9 साल की लड़ाई के बाद मुझे जाकर वो फिल्म मिली जिसकी तलाश थी। उस फिल्म का नाम था 'दिल'। उसके बाद से लेकर आज तक पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ा। 

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