काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव ने मंगलवार को भोर में मंगला आरती के दौरान अपना कलेवर (चोला) छोड़ा दिया। मान्यतानुसार, बाबा अपना कलेवर तब छोड़ते हैं जबकि धरती की किसी आपदा को खुद पर झेलते हैं।
काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव ने छोड़ा अपना चोला, मंदिर प्रांगण से गंगा घाट तक गूंजा शंखनाद
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इस दौरान पूरा क्षेत्र घण्ट-घड़ियाल, डमरू एवं शंखनाद से गूंज उठा। इधर, कलेवर छोड़ने के बाद काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव का बाल स्वरूप श्रृंगार और विशेष पूजन अर्चन किया गया। जिसके बाद मंदिर का पट भक्तों के दर्शन पूजन के लिए खोल दिया गया।
इस दौरान बाबा डमरू और शंखनाद के साथ बाबा की आरती की गई। दोपहर में बाबा काल भैरव का सिंदूर, मोम व देशी घी से लेपन किया गया और बालस्वरूप में परंपरागत तरीके से रजत मुखौटा लगाकर और भव्य श्रृंगार करके महाआरती की गई।
14 साल पहले बाबा ने आंशिक रूप से छोड़ा था अपना कलेवर
मंदिर व्यवस्थापक महंत नवीन गिरी ने बताया कि मान्यता है कि बाबा काल भैरव विश्व पर आने वाली किसी भी विपत्ति को जब अपने ऊपर लेते हैं तो अपना कलेवर छोड़ते हैं। करीब 14 वर्ष पूर्व आंशिक रूप से और करीब 50 वर्ष पूर्व 1971 में बाबा काल भैरव ने पूर्ण रूप से अपना कलेवर छोड़ा था।
मंगलवार की भोर मंगल आरती के दौरान बाबा का आधा कलेवर (चोला) खुद ब खुद नीचे गिर गया। मंदिर में मौजूद पुजारियों कि नजर जब बाबा के कलेवर पर पड़ी तो बाबा काल भैरव की जय एवं हर हर महादेव के नारे से मंदिर परिसर गूंज उठा।