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काशी नरेश के सैलून को फिर से पटरी पर लाने की तैयारी, अंदर से दिखता है कुछ ऐसा

Fri, 20 Jul 2018 06:58 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Fri, 20 Jul 2018 06:58 PM IST
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Kashi Naresh saloon again became in function see photos
varanasi - फोटो : अमर उजाला
उत्तर रेलवे पर्यटकों को राजशाही ठाट का एहसास कराने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए कैंट रेलवे स्टेशन के यार्ड में सालों से धूल खा रहे काशी नरेश के सैलून को नया रूप दिया जा रहा है। हालांकि काशी नरेश के परिवार से अनुमति के बाद ही इस योजना को मूर्त रूप दिया जाएगा। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें..



 
Kashi Naresh saloon again became in function see photos
varanasi - फोटो : अमर उजाला
देश में महाराजा, पैलेज ऑन व्हील्स के साथ ही कालका-शिमला रूट पर आलीशान बोगियों वाली ट्रेनें देशी, विदेशी सैलानियों को सफर का अलग एहसास कराती आई हैं। कैंट रेलवे स्टेशन पर वर्षों से धूल खा रहा काशी नरेश का सैलून भी राजशाही ठाट की भव्यता का एक जीता जागता उदाहरण है। इसमें सभी सुविधाएं थी जो किसी भी सफर को यादगार बना दे। हालांकि सैलून की मौजूदा स्थिति काफी खराब है। 

 
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kashi naresh - फोटो : अमर उजाला
जहां बोगी की लकडि़यां जगह-जगह से खराब हो गई हैं तो वहीं उचित रखरखाव के अभाव में इसका इंटीरियर व दीवारें आदि खराब हो गई हैं। उत्तर रेलवे इसे पुन: इसका पुराना रूप लौटाकर इसे पटरी पर दौड़ाना चाहता है। इसके पीछे उद्देश्य जहां पर्यटकों को यात्रा का भव्य विकल्प उपलब्ध कराना है तो वहीं रेल को राजस्व भी मिलेगा।
 
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varanasi - फोटो : अमर उजाला

काशी नरेश के ऐतिहासिक सैलून का निर्माण 1927 में हावड़ा की बर्न एंड कंपनी ने किया था। यह सैलून सागौन की लकड़ी का बना है। पहली बार 25 अगस्त 1945 को आलमबाग वर्कशाप में इसकी ओवरहालिंग हुई थी। काशी नरेश विभूति नारायण सिंह ने आखिरी बार 1956 में सपरिवार अयोध्या तक का इससे सफर किया था। तब से कैंट स्टेशन पर कोचिंग डिपो कार्यालय के पास यह खड़ा है। वर्ष 2007 में रेलवे ने समूचे सैलून का जीर्णोद्धार कराया। बाहरी हिस्से की पेंटिंग की गई लेकिन अंदरूनी हिस्से को छोड़ दिया गया है। वजह, सैलून की छत पर नक्काशी की गई है।
 
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kashi naresh - फोटो : अमर उजाला

पूर्व काशी नरेश विभूति नारायण सिंह चाहते थे कि ऐतिहासिक सैलून को रामनगर ले जाया जाए। लेकिन विशेषज्ञों ने सलाह नहीं दी। कोचिंग डिपो अधिकारी आरबी दुबे के पत्रचार के बाद कुंवर अनंत नारायण सिंह और राजकुमार हरिप्रिया ने कैंट स्टेशन आकर सैलून को देखा। 20 जुलाई 08 को इस सैलून को रेलवे म्यूजियम को देने के लिए कुंवर और रेलवे बोर्ड के अधिकारियों के बीच पत्राचार भी हो चुका है।

 
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